10 lines short stories with moral in hindi
जब कभी भी short stories with moral in hindi कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।
1. लकड़हारा और सुनहरी कुल्हाड़ी की कहानी : Moral Stories in Hindi in Short
एक समय की बात है जंगल के पास एक लकड़हारा रहता था. वो जंगल में लकड़ी इकठ्ठा करता था और उन्हें पास के बाज़ार में बेचता था कुछ पैसों के लिए।
एक दिन की बात है वो एक पेड़ काट रहा था, तभी हुआ ये की गलती से उसकी कुल्हाड़ी पास की एक नदी में गिर गई. नदी बहुत ज्यादा गहरी थी और वास्तव में तेजी से बह रही थी- उसने बहुत प्रयत्न किया अपने कुल्हाड़ी को खोजने की लेकिन उसे वो वहां नहीं मिली. अब उसे लगा की उसने कुल्हाड़ी खो दी है, वहीँ दुखी होकर वो नदी के किनारे बैठकर रोने लगा।
उसके रोने की आवाज सुनकर नदी के भगवान उठे और उस लकड़हारे से पूछा कि क्या हुआ. लकड़हारा ने उन्हें अपनी दुखद कहानी बताई. नदी के भगवान को उस लकड़हारे के ऊपर दया आई और वो उसकी मेहनत और सच्चाई देखकर उसकी मदद करने की पेशकश की।
वो नदी में गायब हो गए और एक सुनहरी कुल्हाड़ी वापस लाया, लेकिन लकड़हारे ने कहा कि यह उसका नहीं है. वो फिर से गायब हो गए और अब की बार उन्होंने चांदी की कुल्हाड़ी लेकर वापस आये, लेकिन इस बार भी लकड़हारे ने कहा कि ये कुल्हाड़ी उसका भी नहीं है।
अब नदी के भगवान पानी में फिर से गायब हो गए और अब की बार वो एक लोहे की कुल्हाड़ी के साथ वापस आ गए – लकड़ी का कुल्हाड़ी देखकर लकड़हारा मुस्कुराया और कहा कि यह उसकी कुल्हाड़ी है।
नदी के भगवान ने लकड़हारे की ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे सोने और चांदी की दोनों कुल्हाड़ियों से भेंट किया।
सीख
इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है की ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।
2. मूर्ख गधा की कहानी : Simple Short Motivation Stories in Hindi
एक नमक बेचने वाला रोज अपने गधे पर नमक की थैली लेकर बाजार जाता था।
रास्ते में उन्हें एक नदी पार करना पड़ता था। एक दिन नदी पार करते वक्त, गधा अचानक नदी में गिर गया और नमक की थैली भी पानी में गिर गई। चूँकि नमक से भरा थैला पानी में घुल गया और इसलिए थैला ले जाने के लिए बहुत हल्का हो गया।
इसकी वजह से गधा बहुत ही खुश था। अब फिर गधा रोज वही चाल चलने लगा, इससे नमक बेचने वाले को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ता।
नमक बेचने वाले को गधे की चाल समझ में आ गई और उसने उसे सबक सीखाने का फैसला किया। अगले दिन उसने गधे पर एक रुई से भरा थैला लाद दिया।
अब गधे ने फिर से वही चाल चली। उसे उम्मीद थी कि रुई का थैला अभी भी हल्का हो जाएगा।
लेकिन गीला रुई (कपास) ले जाने के लिए बहुत भारी हो गया और गधे को नुकसान उठाना पड़ा। उसने इससे एक सबक सीखा। उस दिन के बाद उसने कोई चाल नहीं चली और नमक बेचने वाला खुश था।
सीख
इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की भाग्य हमेशा साथ नहीं देता है, हमेशा हमें अपने बुद्धि का भी इस्तमाल करना चाहिए।।
3. लोमड़ी और अंगूर की कहानी : Good Short Moral Stories in Hindi
बहुत दिनों पहले की बात है, एक बार एक जंगल में एक लोमड़ी को बहुत भूख लगी। उसने पूरी जंगल में छान मारा लेकिन उसे कहीं पर भी खाने को कुछ भी नहीं मिला। इतनी मेहनत से खोज करने के बाद भी , उसे कुछ ऐसा नहीं मिला जिसे वह खा सके।
अंत में, जैसे ही उसका पेट गड़गड़ाहट हुआ, वह एक किसान की दीवार से टकरा गया। दीवार के शीर्ष पर पहुँचकर, उसने अपने सामने बहुत से बड़े, रसीले अंगूरों को देखा। वो सभी अंगूर दिखने में काफ़ी ताज़े और सुंदर थे। लोमड़ी को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे खाने के लिए तैयार हैं।
अंगूर तक पहुँचने के लिए लोमड़ी को हवा में ऊंची छलांग लगानी पड़ी। कूदते ही उसने अंगूर पकड़ने के लिए अपना मुंह खोला, लेकिन वह चूक गया। लोमड़ी ने फिर कोशिश की लेकिन फिर चूक गया।
उसने कुछ और बार कोशिश की लेकिन असफल रहा।
अंत में, लोमड़ी ने फैसला किया कि वो अब और कोशिश नहीं कर सकता है और उसे घर चले जाना चाहिए। जब वह चला गया, तो वह मन ही मन बुदबुदाया, “मुझे यकीन है कि अंगूर वैसे भी खट्टे थे।”
सीख
इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है की जो हमारे पास नहीं है उसका कभी तिरस्कार न करें; कुछ भी आसान नहीं आता।
4. घमंडी बारहसिंगा : (Moral Stories In Hindi)
एक समय की बात है। एक घने जंगल में एक बारहसिंगा रहता था। वह बड़ा घमंडी था। एक बार वह तालाब में पानी पी रहा था और पानी पीते हुए उसने अपनी परछाई देखी। वो अपने सुन्दर सींगो को देखकर बहुत खुश हुआ, पर अपनी पतली टाँगो को देखकर बहुत दुखी हुआ और वो भगवान को कोसने लगा।
एक बार कुछ शिकारी कुत्ते जंगल में आ गए और वो बारहसिंगा के पीछे पड़ गए। ये देखकर वो घबराकर दूर भाग गया। उसकी पतली टाँगे ही उसकी भागने में सहायता कर रही थी। भागते-भागते अचानक उसके सींग टहनियों के बीच फँस गए।
उसने अपने सींगों को बाहर निकालने की बहुत कोशिश की, पर वह अपने सींगों को बाहर ना निकाल पाया। जिसके बाद उन शिकारी कुत्तों ने उसे घायल कर दिया और वो मरने की हालत में हो गया था। मरते समय वह सोचता रहा, “इन सुंदर सींगों ने मुझे मरवाया है और मेरी पतली टाँगे मुझे बचा सकती थी।”
सीख
कोई भी चीज़ अपने गुणों के कारण सुंदर होती है।
5. प्यासा कौआ : (Story For Kids In Hindi)
एक बार की बात है, गर्मी का महीना था। एक कौए को बहुत तेज़ प्यास लगी थी। वह पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ने लगा, पर उसे कही भी पानी ना मिला। तेज़ गर्मी के कारण उसकी प्यास ओर बढ़ती जा रही थी। कौए ने जीने की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन उसने हार नहीं मानी, वह पानी की तलाश करने फिर चला गया, अचानक उसे एक पानी से भरा घड़ा दिखाई दिया। वह उस घड़े को देखकर बहुत खुश हो गया और तुरंत उड़कर घड़े के पास गया।
घड़े में पानी इतना कम था कि, उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुँच सकी। यह देखकर वो परेशान हो गया। उसने हर तरीके से पानी पीने की कोशिश करी पर वो सफल ना हो पाया
वह निराश होकर जैसे ही वहाँ से जाने लगा तो उसकी नज़र अचानक कंकर पर पड़ी।
वह एक-एक कंकर अपनी चोंच से उठाकर पानी में डालने लगा। धीरे-धीरे पानी ऊपर आ गया और कौए ने जी भर कर पानी पिया और वहाँ से उड़ गया।
शिक्षा – जब हमारे अंदर किसी चीज़ को पाने की इच्छा होती है तो हम वो चीज़ अवश्य हासिल कर पाते है।
प्यासा कौआ से जुड़ी एक प्रसिद्ध कविता
एक कौआ प्यासा था
जग में पानी थोड़ा था,
कौए ने डाला कंकर,
पानी आया ऊपर,
कौए ने पीया पानी,
खत्म हुई कहानी।।
6. सोने का अंडा देने वाले हंस की कहानी : (Short Stories In Hindi For Kids)
एक गाँव में एक हंस पालन करने वाला अपनी पत्नि के साथ रहता था। वह हर रोज बाजार में जाकर हंस खरीदता और घर आकर उनकी देखभाल करता था। हर दिन की तरह वो बाजार से एक हंस खरीद कर लाया। वो सबकी तरह उसे भी बहुत प्यार से पालने लगा और धीरे-धीरे वो हंस तंदुरुस्त बन गया। कुछ महीने बाद उस हंस ने अंडा दिया, जिसको देखने के बाद व्यापारी और उसकी पत्नी दोनों ही हैरान रह गए। वह अंडा सोने का था।
वह हंस हमेशा सोने का अंडा देता और पति-पत्नी उसे बेचकर पैसे कमाते। सोने के अंडे को देखकर उनके मन में लालच बढ़ने लगा और व्यापारी ने सोचा कि, अगर ये हर रोज एक सोने का अंडा देता है तो उसके अंदर और कितने अंडे होंगे। ये सोचकर उन्हें एक तरकीब आई और उन्होंने हंस को मार डाला और जब उसका पेट चीर कर देखा तो उस में एक भी अंडा नहीं था जिसके बाद वो बहुत रोए।
सीख
लालच बुरी बला है।
7. कौवे की गिनती (Tenalirama Short Moral Stories In Hindi)
एक दिन की बात है, राजा कृष्णदेवराय ने अपने दरबार में एक अजीब सा सवाल पूछा, जिससे पूरी सभा के लोग हैरान रह गए। जैसे ही वे सभी उत्तर जानने की कोशिश कर रहे थे, तभी तेनालीराम दरबार के अंदर आए और पूछा कि मामला क्या है।
उन्होंने मन ही मन सवाल दोहराया। सवाल था की, “शहर में कितने कौवे हैं?“
तेनालीराम तुरंत मुस्कुराए और महाराज के पास गए और उन्होंने उत्तर की घोषणा की; उनका जवाब था की, नगर में इक्कीस हजार पांच सौ तेईस कौवे हैं। महाराज द्वारा यह पूछे जाने पर कि वह उत्तर कैसे जानते हैं, तब तेनालीराम ने उत्तर दिया, “महाराज आप अपने आदमियों से कौवे की संख्या गिनने के लिए कहें।
यदि अधिक मिले, तो कौवे के रिश्तेदार उनके पास आस-पास के शहरों से आ रहे होंगे। यदि कम हैं, तो हमारे शहर के कौवे शहर से बाहर रहने वाले अपने रिश्तेदारों के पास जरूर गए होंगे।”
यह जवाब सुनकर, राजा को काफ़ी संतोष मिला। इस उत्तर से प्रसन्न होकर महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को एक माणिक और मोती की जंजीर भेंट की। वहीं उन्होंने तेनालीराम की बुद्धि की काफ़ी प्रसंशा करी।
सीख
आपके उत्तर में सही स्पष्टीकरण होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सही उत्तर का होना
8. लालची बंदर : Short Animal Stories in Hindi
एक बंदर रोज एक आदमी के घर आता था और दंगा करता था । कभी कपड़े फाड़ देता, कभी बर्तन ढोता, कभी बच्चों को पीटता। उसने खाने-पीने की चीजें भी ले लीं, लेकिन उसके परिवार को कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन वे बंदरों से त्रस्त थे।
एक दिन घर के कर्ता ने कहा, “मैं इस बंदर को पकड़ कर निकाल दूंगा।” केवल घागरी का मुंह खुला रह गया था। सब चले गए। बंदर घर में आया। कुछ देर बाद वह कूद कर बाहर आया। जब उसने दबे हुए घड़े में छोले देखे तो वह वहीं बैठ गया।
चना निकालने के लिए उसने जार में हाथ डाला और एक मुट्ठी चना पकड़ लिया। लेकिन घड़े का मुंह छोटा होने के कारण हाथ का हत्था बाहर नहीं निकला। इसके लिए उसने जोर से धक्का दिया और कूदने लगा। लेकिन लालची बंदर ने हाथ के चने नहीं छोड़े।
फिर नौकर ने बंदर को रस्सी से बांधकर बाहर निकाला। लालची बंदर पकड़ा गया।
सीख
लालच बुरी बला है।
9. सच्ची दोस्ती का महत्व : Moral Story For Kids
अरुण गर्मी की छुट्टी में अपनी नानी के घर जाता है। वहां अरुण को खूब मजा आता है, क्योंकि नानी के यहाँ आम का बगीचा है। वहां अरुण ढेर सारे आम खाता है और खेलता है। उसके पांच दोस्त भी हैं, पर उन्हें अरुण आम नहीं खिलाता है।
एक दिन की बात है, अरुण को खेलते खेलते चोट लग गई। अरुण के दोस्तों ने अरुण को उठाकर घर पहुंचाया और उसकी मम्मी से उसके चोट लगने की बात बताई, इस पर अरुण को मालिश किया गया।
मम्मी ने उन दोस्तों को धन्यवाद किया और उन्हें ढेर सारे आम खिलाएं। अरुण जब ठीक हुआ तो उसे दोस्त का महत्व समझ में आ गया था। अब वह उनके साथ खेलता और खूब आम खाता था।
सीख
जीवन में सच्चे मित्र का महत्व बहुत है।
10. एकता में बल : Good Short Moral Stories in Hindi
एक व्यक्ति के पांच पुत्र थे, लेकिन पुत्रों के बीच पूर्ण सामंजस्य नहीं था वो एक दुसरे से झगड़ते रहते थे।
जब वह व्यक्ति मरने ही वाला था, तो उसने 5 लड़को को बुलाकर बैठा दिया, और पतली छड़ियों का एक पूरा गट्ठर दिया और उनमें से एक से कहा, “तुम इस गट्ठर को तोड़ दो, लेकिन पांचो पुत्रो से किसी ने पूरी गट्ठर नहीं तोड़ पाया,
तब उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा अब गट्ठर को छोड़ दें, और हर एक पुत्र एक एक डंडे को तोड़ दो। पुत्रो ने ऐसा किया तो सारी डंडिया तुरंत टूट गईं।
पांचो पुत्र बहुत हैरान हुए और उन्होंने पिता से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया। फिर उसने कहा, वे सब लाठियां एक साथ इकट्ठी थी, सो उन में इतना बल था कि सारा गट्ठर तुमसे से न टूटा। लेकिन जब एक एक लाठी अलग हो गई, तो उसे दूसरी छड़ियों के बल से सहारा नहीं मिला। तो यह तुरंत टूट गया।
इस तरह अगर आप सब एक हो जाएं तो आपको कोई अलग नहीं कर सकता और आपकी जवानी खुशियों में चली जाएगी। लेकिन अगर आपस में लड़ो और बिछड़ो तो तुम भी कमजोर हो जाओगे और डंडे की तरह टूट जाओगे, इसलिए अभी से साथ रहो।
सीख
एकता में बल होता है
11. हीरे की खान Good Short Moral Stories in Hindi
अफ्रीका महाद्वीप में हीरों की कई खानों की खोज हो चुकी थी, जहाँ से बहुतायत में हीरे प्राप्त हुए थे. वहाँ के एक गाँव में रहने वाला किसान अक्सर उन लोगों की कहानियाँ सुना करता था, जिन्होंने हीरों की खान खोजकर अच्छे पैसे कमाये और अमीर बन गए. वह भी हीरे की खान खोजकर अमीर बनना चाहता था.
एक दिन अमीर बनने के सपने को साकार करने के लिए उसने अपना खेत बेच दिया और हीरों की खान की खोज में निकल पड़ा. अफ्रीका के लगभग सभी स्थान छान मारने के बाद भी उसे हीरों का कुछ पता नहीं चला. समय गुजरने के साथ उसका मनोबल गिरने लगा. उसे अपना अमीर बनने का सपना टूटता दिखाई देने लगा. वह इतना हताश हो गया कि उसके जीने की तमन्ना ही समाप्त हो गई और एक दिन उसने नदी में कूदकर अपनी जान दे में दी. इस दौरान दूसरा किसान, जिसने पहले किसान से उसका खेत खरीदा था, एक दिन उसी खेत के मध्य बहती छोटी नदी पर गया. सहसा उसे नदी के पानी में से इंद्रधनुषी प्रकाश फूटता दिखाई पड़ा. उसने ध्यान से देखा, तो पाया कि नदी के किनारे एक पत्थर पर सूर्य की किरणें पड़ने से वह चमक रहा था. किसान ने झुककर वह पत्थर उठा लिया और घर ले आया. वह एक ख़ूबसूरत पत्थर था. उसने सोचा कि यह सजावट के काम आएगा और उसने उसे घर पर ही सजा लिया.
कई दिनों तक वह पत्थर उसके घर पर सजा रहा. एक दिन उसके घर उसका एक मित्र आया. उसने जब वह पत्थर देखा, तो हैरान रह गया. उसनेकिसान से पूछा, “मित्र! तुम इस पत्थर ही कीमत की जानते हो?” किसान ने जवाब दिया, "नहीं." “मेरे ख्याल से ये हीरा है. शायद अब तक खोजे गए हीरों में सबसे बड़ा हीरा.” मित्र बोला. किसान के लिए इस बात पर यकीन करना मुश्किल था. उसने अपने मित्र को बताया कि उसे यह पत्थर अपने खेत की नदी के किनारे मिला है. वहाँ ऐसे और भी पत्थर हो सकते हैं.” दोनों खेत पहुँचे और वहाँ से पत्थर नमूने के तौर पर चुन लिए.
फिर उन्हें जाँच के लिए भेज दिया. जब जाँच रिपोर्ट आयी, तो किसान के मित्र की बात सच निकली. वे पत्थर हीरे ही थे. उस खेत में हीरों का भंडार था. वह उस समय तक खोजी गई सबसे कीमती हीरे की खदान थी. उसका खदान का नाम 'किम्बलें डायमंड माइन्स' है. दूसरा किसान उस खदान की वजह से मालामाल हो गया. पहला किसान अफ्रीका में दर-दर भटका और अंत में जान दे दी. जबकि हीरे की खान उसके अपने खेत में उसके क़दमों तले थी.
सीख मित्रों, इस कहानी में हीरे पहले किसान के कदमों तले ही थे, लेकिन वह उन्हें पहचान नहीं पाया और उनकी खोज में भटकता रहा. ठीक वैसे ही हम भी सफलता प्राप्ति के लिए अच्छे अवसरों की तलाश में भटकते रहते हैं. हम उन अवसरों को पहचान नहीं पाते या पहचानकर भी महत्व नहीं देते, जो हमारे आस-पास ही छुपे रहते हैं. जीवन में सफ़ल होना है, तो आवश्यकता है बुद्धिमानी और परख से उन अवसरों को पहचानने की और धैर्य से अनवरत कार्य करने की सफ़लता निश्चित है.
12. हीरे की खान
अफ्रीका महाद्वीप में हीरों की कई खानों की खोज हो चुकी थी, जहाँ से बहुतायत में हीरे प्राप्त हुए थे. वहाँ के एक गाँव में रहने वाला किसान अक्सर उन लोगों की कहानियाँ सुना करता था, जिन्होंने हीरोंकी खान खोजकर अच्छे पैसे कमाये और अमीर बन गए. वह भी हीरे की खान खोजकर अमीर बनना चाहता था.
एक दिन अमीर बनने के सपने को साकार करने के लिए उसने अपना खेत बेच दिया और हीरों की खान की खोज में निकल पड़ा. अफ्रीका के लगभग सभी स्थान छान मारने के बाद भी उसे हीरों का कुछ पता नहीं चला. समय गुजरने के साथ उसका मनोबल गिरने लगा. उसे अपना अमीर बनने का सपना टूटता दिखाई देने लगा. वह इतना हताश हो गया कि उसके जीने की तमन्ना ही समाप्त हो गई और एक दिन उसने नदी में कूदकर अपनी जान दे में दी. इस दौरान दूसरा किसान, जिसने पहले किसान से उसका खेत खरीदा था, एक दिन उसी खेत के मध्य बहती छोटी नदी पर गया. सहसा उसे नदी के पानी में से इंद्रधनुषी प्रकाश फूटता दिखाई पड़ा. उसने ध्यान से देखा, तो पाया कि नदी के किनारे एक पत्थर पर सूर्य की किरणें पड़ने से वह चमक रहा था. किसान ने झुककर वह पत्थर उठा लिया और घर ले आया. वह एक ख़ूबसूरत पत्थर था. उसने सोचा कि यह सजावट के काम आएगा और उसने उसे घर पर ही सजा लिया.
कई दिनों तक वह पत्थर उसके घर पर सजा रहा. एक दिन उसके घर उसका एक मित्र आया. उसने जब वह पत्थर देखा, तो हैरान रह गया. उसनेकिसान से पूछा, “मित्र! तुम इस पत्थर ही कीमत की जानते हो?” किसान ने जवाब दिया, "नहीं." “मेरे ख्याल से ये हीरा है. शायद अब तक खोजे गए हीरों में सबसे बड़ा हीरा.” मित्र बोला. किसान के लिए इस बात पर यकीन करना मुश्किल था. उसने अपने मित्र को बताया कि उसे यह पत्थर अपने खेत की नदी के किनारे मिला है. वहाँ ऐसे और भी पत्थर हो सकते हैं.” दोनों खेत पहुँचे और वहाँ से पत्थर नमूने के तौर पर चुन लिए.
फिर उन्हें जाँच के लिए भेज दिया. जब जाँच रिपोर्ट आयी, तो किसान के मित्र की बात सच निकली. वे पत्थर हीरे ही थे. उस खेत में हीरों का भंडार था. वह उस समय तक खोजी गई सबसे कीमती हीरे की खदान थी. उसका खदान का नाम 'किम्बलें डायमंड माइन्स' है. दूसरा किसान उस खदान की वजह से मालामाल हो गया. पहला किसान अफ्रीका में दर-दर भटका और अंत में जान दे दी. जबकि हीरे की खान उसके अपने खेत में उसके क़दमों तले थी.
सीख मित्रों, इस कहानी में हीरे पहले किसान के कदमों तले ही थे, लेकिन वह उन्हें पहचान नहीं पाया और उनकी खोज में भटकता रहा. ठीक वैसे ही हम भी सफलता प्राप्ति के लिए अच्छे अवसरों की तलाश में भटकते रहते हैं. हम उन अवसरों को पहचान नहीं पाते या पहचानकर भी महत्व नहीं देते, जो हमारे आस-पास ही छुपे रहते हैं. जीवन में सफ़ल होना है, तो आवश्यकता है बुद्धिमानी और परख से उन अवसरों को पहचानने की और धैर्य से अनवरत कार्य करने की सफ़लता निश्चित है.
13. एक फकीर हुआ, अगस्तीन।
एक फकीर हुआ, अगस्तीन। कोई तीस वर्षों से परमात्मा की खोज में था। भूखा और प्यासा, रोता और चिल्लाता और प्रार्थना करता। एक क्षण का विश्राम न लेता। जीवन का कोई भरोसा नहीं है। परमात्मा को पा लेना है। तो सब भांति के उपाय उसने किए। बूढ़ा हो गया था, थक गया था, परमात्मा की कोई प्राप्ति न हुई थी। कोई दूर, परमात्मा निकट नहीं आया। बुढ़ापा निकट आ रहा था, मौत करीब आ रही थी उतने ही प्राण और चिंतित होते जाते थे। एक दिन सुबह-सुबह ही…रात भर रो कर भगवान से प्रार्थना करता रहा कि कब मुझे दर्शन दोगे? सुबह उठा और नदी के, समुद्र के किनारे घूमने चला गया। सूरज उगने को था। किनारा एकांत था समुद्र का, कोई भी वहां न था। थोड़ी दूर चलने पर एक छोटा-सा बच्चा उसे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा एक चट्टान के पास। बहुत चिंतित, बहुत परेशान वह बच्चा था। अगस्तीन ने पूछाः तू किसलिए इतना परेशान है? और इतने सुबह-सुबह इस अकेले समुद्र के किनारे क्यों चला आया? उस बच्चे ने, अपने कंधे पर एक झोली टांग रखी थी। उस झोली में से एक बर्तन निकाला, छोटा सा बर्तन, और उसने कहा, मैं परेशान हूं। मैं इस बर्तन में समुद्र को भर लेना चाहता हूं लेकिन यह समुद्र भरता ही नहीं।
उस बच्चे का यह कहना था कि मैं इस बर्तन में इस समुद्र को भर लेना चाहता हूं, लेकिन यह भरता ही नहीं है।।और जैसे अगस्तीन के सामने कोई बंद द्वार खुल गया। और वह एकदम जोर से हंसने लगा और रोने भी लगा। तो उस बच्चे ने पूछा कि आपको क्या हो गया है? अगस्तीन ने कहा कि तू ही नासमझ नहीं है जो एक छोटे से बर्तन में समुद्र को भरने निकल पड़ा है। मैं भी नासमझ हूं। मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में परमात्मा को पकड़ने चला था। मैं अपने छोटे से मस्तिष्क में सत्य को समाने निकल पड़ा था। अगर तू नासमझ है तो मैं और भी ज्यादा नासमझ हूं। समुद्र की तो फिर भी सीमा है, और हो सकता है, और हो सकता है किसी बड़ी प्याली में समुद्र बन भी जाए।।प्याली की भी सीमा है, और समुद्र की भी सीमा है। लेकिन मेरी बुद्धि की तो सीमा है और परमात्मा की कोई सीमा नहीं। मैं तुझसे भी ज्यादा नासमझ रहा। तीस वर्ष मैं पागल था कि मैं ईश्वर को जानने चला था। तीस वर्ष मैंने गंवाए, रोया और पीड़ित हुआ अनेक बार परमात्मा को मैंने दोष दिया कि तू कैसा निर्दय और कठोर है कि मैं रोता हूं, मेरे आंसू तुझ तक नहीं पहुंचते। और आज मैं समझ पाया कि मेरी भूल वही थी जो तेरी भूल है। मैं परमात्मा की खोज छोड़ता हूं। मैं परमात्मा को जानने का पागलपन छोड़ता हूं।
वह नाचता हुआ वापस लौट आया अपने आश्रम में। वहां के और संन्यासियों ने कहाः क्या तुम्हें परमात्मा मिल गया जो तुम आज खुश हो? जो कि तीस वर्षों से कभी मुस्कराते नहीं देखे गए, आज नाचते हो, क्या तूने उसको पा लिया? क्या तुमने उसे जान लिया? अगस्तीन ने कहाः उसे तो मैंने नहीं पाया, लेकिन अपने को खो दिया। उसे तो मैंने नहीं जाना, लेकिन अपने जानने के पागलपन को मैं समझ गया। और जिस क्षण मैंने यह दौड़ छोड़ दी और जानने का यह भ्रम छोड़ दिया उस क्षण मैंने पाया, वह तो सामने ही था। वह तो सामने ही है। मैं भी तो वही हूं। मैंने उसे कभी खोया ही नहीं था। लेकिन उसे खोजने और जानने के पागलपन में मैं पड़ गया था और मैं इसी भूल में उसे खोए हुए था जो कि अभी खोया हुआ नहीं था।
अगस्तीन का जानने का खयाल छूटा और उसने जान लिया। अज्ञान के लिए मैंने कहा है कि यह अज्ञान हमारे अहंकार की मृत्यु बन जाएगी, अगर मैं यह ठीक से जान सकूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं और मैं यह जान सकूं कि जो असीम है वह सीमित बुद्धि से नहीं जाना जा सकेगा; और मैं यह जान सकूं कि प्याली में समुद्र भरना पागलपन है, और अपनी बुद्धि में सत्य को भर लेने का खयाल और भी बड़ा पागलपन है। अगर यह मुझे दिखाई पड़ जाए, तो मैं तो गया, मेरी सामथ्र्य तो मिट गई। मैं तो रिक्त और शून्य हो गया। और जिस क्षण कोई व्यक्ति उस स्थिति में पहुंच जाता है जहां उसे यह भी भ्रम नहीं रह जाता कि मैं जानता हूं।।अज्ञान की, न जानने की, स्टेट ऑफ नॉट नोइंग में है, जब कि उसे कुछ भी प्रतीत नहीं होता कि मैं जानता हूं, मन एकदम मौन और शांत हो जाता है। उसी शांति में जाना जाता है।
अज्ञान ज्ञान का द्वार है, अज्ञान का बोध। लेकिन हम सारे लोग अज्ञान को ढांक लेते हैं उधार ज्ञान से। अज्ञान तो भीतर बना रहता है, ज्ञान बाहर से इकट्ठा कर लाते हैं। और उस ज्ञान के ऊपर, छा जाता है हमारा अज्ञान के ऊपर। ऐसे अज्ञान को भीतर छिपा लेते हैं। आप जानते हैं, ईश्वर है? भीतर अगर झांकेंगे तो पता चलेगा, नहीं जानता हूं। लेकिन अगर बुद्धि से पूछेंगे तो बुद्धि कहेगी, हां ईश्वर तो है, किताबों में लिखा है। गुरु कहते हैं, ऋषि मुनि कहते हैं, ईश्वर है। जब तक कोई और कहता है, ईश्वर है तब तक आपके लिए ईश्वर नहीं है। जिस दिन आपके प्राण जानेंगे, उसी दिन होगा। उसके पहले नहीं हो सकता।
14. जीने की कला – प्रेरणादायक लेख!
एक शाम माँ ने दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब रात का खाना बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी। मुझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर कोई कुछ कहेगा। परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया। मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए “साॅरी” बोलते हुए जरूर सुना था।
और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा “मुझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद है!” देर रात को मैंने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है? उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा:- तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, और वो सचमुच बहुत थकी हुई थी और… वेसे भी… एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती, परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।
तुम्हें पता है बेटा जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से… अपूर्ण लोगों से… कमियों से… दोषों से… मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ मैंने इतने सालों में सीखा है कि एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करो… अनदेखी करो… और चुनो… पसंद करो… आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना!
मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है… उसे हर सुबह दु:ख… पछतावे… खेद के साथ जताते हुए बर्बाद न करें! जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करो और जो नहीं करते उनके लिए अपनांपन – सहानुभूति रखो!
किसी ने क्या खूब कहा है:-
“मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों को प्यार करने में जो मुझे पसंद करते है”
15. लक्खण मृग की कहानी
हकई वर्षों पहले मगध जनपद नामक एक नगर हुआ करता था। उसी के पास एक घना जंगल था, जहां हजार हिरणों का एक समूह रहा करता था। हिरणों के राजा के दो पुत्र थे, जिनमें से एक का नाम लक्खण और दूसरे का काला था। जब राजा बहुत बुढ़ा हो गया, तो उसने अपने दोनों बेटों को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। दोनों के हिस्से में 500-500 हिरण आए।
लक्खण और काला के उत्तराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद मगधवासियों के लिए खेतों में लगी फसल काटने का समय आ गया था। इसलिए, किसानों ने फसल को जंगली जानवरों से बचाने के लिए खेतों के पास कई तरह के उपकरण लगा दिए। साथ ही खाइयों का निर्माण करने लगे। इसकी जानकारी मिलते ही हिरणों के राजा ने दोनों बेटों को अपने-अपने समुह के साथ दूर सुरक्षित पहाड़ी इलाके में जाने के लिए कहा।
पिता की बात सुनते ही काला तुरंत अपने समुह के साथ पहाड़ी की ओर निकल गया। उसने जरा भी नहीं सोचा कि दिन के उजाले में लोग उनका शिकार कर सकते हैं और असल में हुआ भी यही। रास्ते में कई हिरण शिकारियों का शिकार बन गए। वहीं, लक्खण बुद्धिमान मृग था। इसलिए, उसने अपने साथियों के साथ रात के अंधेरे में पहाड़ी की ओर निकलने का फैसला किया और सभी सुरक्षित पहाड़ी तक पहुंच गए।
कुछ महीने बाद जब फसल कट गई तब लक्खण और काला वापस जंगल लौट आए। दोनों समूह के साथ वापस लौटे, तो उनके पिता ने देखा कि लक्खण के समूह के सारे मृग साथ है और काला के समूह में हिरणों की संख्या कम थी। इसके बाद सभी को लक्खण की बुद्धिमत्ता के बारे में पता चला, जिसकी सभी ने प्रशंसा की।
कहानी से सीख कोई भी काम करने से पहले कई बार सोचना चाहिए, तभी उसको करना चाहिए। इससे हमेशा सफलता मिलती है।
16. ” गुरु की खुशबु ” एक प्रेरक प्रसंग
निजामुद्दीन औलिया एक महान मुस्लिम संत हुए हैं। एक बार एक गरीब आदमी,जिसकी बेटी विवाह योग्य थी, संत औलिया के पास इस उद्देश्य से आया कि कुछ सहायता मिल जायेगी क्योंकि संत बड़े दयालु होते हैं।
संत से जब गरीब आदमी ने निवेदन किया तो संत ने कहा:” भई! मैं तो फकीर हूं, मेरे पास तो कुछ धन है नहीं, ऐसा कर ये मेरी दो जूतियां हैं, इनको ले जाओ।वह आदमी जूतियां लेकर चल दिया और सोचने लगा कि चलो, जूतियां बेचकर दो वक्त की रोटियों का इंतजाम हो गया।
उधर अकबर के नवरत्नों में से एक अमीर खुसरो को तीव्र वैराग्य हुआ। अपने जीवन भर की कमाई को एक ऊंट पर लाद कर, यह सोचकर चल दिया कि यह समस्त धन अपने गुरु (निजामुद्दीन औलिया) के चरणों में समर्पित कर दूंगा और शेष जीवन गुरु की सेवा करुंगा।
यह सोचता हुआ अमीर खुसरो गुरु के आश्रम की ओर बढ़ता जा रहा था और दूसरी ओर से वह गरीब आदमी आ रहा था।अमीर खुसरो को अचानक एक सरस गंध आई, नेत्र भर आये, मेरे पीर की, मेरे आका की, मेरे गुरु की गंध आ रही है। मेरे गुरुदेव कहीं आसपास हैं ऐसा उसे अहसास होने लगा।
तभी वह गरीब आदमी नजदीक आया तो अमीर खुसरो ने उससे कहा: ” जल्दी बता तेरे पास क्या है? मुझे मेरे गुरु की खुशबु आ रही है। गरीब आदमी ने बताया कि औलिया की पादुकाएं मेरे पास हैं।
बस फिर क्या था, अमीर खुसरो बोले, ला, मेरे जीवन की समस्त कमाई ले ले और बदले में पादुकाएं मुझे दे दे। क्या दृश्य रहा होगा? गरीब आदमी सोच रहा है कि संत के द्वार से कोई खाली हाथ नहीं जाता और उधर समस्त धन के बदले पादुकाएं पाकर अपने को मालामाल समझ रहा है। कहा भी गया है कि समर्थ गुरु और समर्पित शिष्य की लीला अपरम्पार है। जय गुरुदेव ।
17. "आत्मविश्वास" सबसे बड़ा हथियार
बादशाह अकबर और बीरबल के बीच कभी-कभी ऐसी बातें भी हुआ करती थीं जिनकी परख करने में जान का खतरा रहता था।
एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा- 'बीरबल, संसार में सबसे बड़ा हथियार कौन-सा है?'
बीरबल ने जवाब दिया बादशाह अकबर- संसार में सबसे बड़ा हथियार है आत्मविश्वास।'
बादशाह अकबर ने बीरबल की इस बात को सुनकर अपने दिल में रख लिया और किसी समय में इसको परखने का निश्चय किया।
दैवयोग से एक दिन एक हाथी पागल हो गया। ऐसे में हाथी को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था।
बादशाह अकबर ने बीरबल के आत्मविश्वास की परख करने के लिए उधर तो बीरबल को बुलवा भेजा और इधर हाथी के महावत को हुक्म दिया कि जैसे ही बीरबल को आता देखे, वैसे ही हाथी की जंजीर खोल दे।
बीरबल को इस बात का पता नहीं था। जब वे बादशाह अकबर से मिलने उनके दरबार की ओर जा रहे थे, तो पागल हाथी को छोड़ा जा चुका था। बीरबल अपनी ही मस्ती में चले जा रहे थे कि उनकी नजर पागल हाथी पर पड़ी, जो चिंघाड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा था।
बीरबल बेहद बुद्धिमान, चतुर और आत्मविश्वासी थे। वे समझ गए कि बादशाह अकबर ने आत्मविश्वास और बुद्धि की परीक्षा के लिए ही पागल हाथी को छुड़वाया है।
दौड़ता हुआ हाथी सूंड को उठाए तेजी से बीरबल की ओर चला आ रहा था। बीरबल ऐसे स्थान पर खड़े थे कि वह इधर-उधर भागकर भी नहीं बच सकते थे। ठीक उसी वक्त बीरबल को एक कुत्ता दिखाई दिया। हाथी बहुत निकट आ गया था। इतना करीब कि वह बीरबल को अपनी सूंड में लपेट लेता।
तभी बीरबल ने झटपट कुत्ते की पिछली दोनों टांगें पकड़ीं और पूरी ताकत से घुमाकर हाथी पर फेंका। बुरी तरह घबराकर चीखता हुआ कुत्ता जब हाथी से जाकर टकराया तो उसकी भयानक चीखें सुनकर हाथी भी घबरा गया और पलटकर भागा।
बादशाह अकबर को बीरबल की इस बात की खबर मिल गई और उन्हें यह मानना पड़ा कि बीरबल ने जो कुछ कहा है, वह सच है। आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार है।
18. महामूर्ख की उपाधि
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे। इस अवसर पर हास्य-मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे। हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था। सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था।
कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम सबका मनोरंजन करते थे। वे बहुत तेज दिमाग के थे। उन्हें हर साल का सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था, ‘महामूर्ख’ का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते।
दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे। उन्होंने एक बार मिलकर तेनालीराम को हराने की युक्ति निकाली। इस बार होली के दिन उन्होंने तेनालीराम को खूब छककर भांग पिलवा दी। होली के दिन तेनालीराम भांग के नशे में देर तक सोते रहे। उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी। वे भागते हुए दरबार पहुंचे। आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे।
कृष्णदेव राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, 'अरे मूर्ख तेनालीरामजी, आज के दिन भी भांग पीकर सो गए?'
राजा ने तेनालीराम को 'मूर्ख' कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए।
उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, 'आपने बिलकुल ठीक कहा, तेनालीराम मूर्ख ही नहीं महामूर्ख हैं।'
जब तेनालीराम ने सबके मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, 'धन्यवाद महाराज, आपने अपने मुंह से मुझे महामूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया।'
तेनालीराम की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे?
क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से तेनालीराम को महामूर्ख ठहरा चुके थे। हर साल की तरह इस साल भी तेनालीराम ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार जीत ले गए।
19. नाई की उच्च नियुक्ति
शाही नाई का कार्य प्रतिदिन राजा कृष्णदेव राय की दाढ़ी बनाना था। एक दिन, जब वह दाढ़ी बनाने के लिए आया तो राजा कृष्णदेव राय सोए हुए थे। नाई ने सोते हुए ही उनकी दाढ़ी बना दी।
उठने पर राजा ने सोते हुए दाढ़ी बनाने पर नाई की बहुत प्रशंसा की। राजा उससे बहुत प्रसन्न हुए और उसे इच्छानुसार कुछ भी मांगने को कहा।
इस पर नाई बोला, 'महाराज, मैं आपके शाही दरबार का दरबारी बनना चाहता हूं।'
राजा नाई की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हो गए। नाई की उच्च नियुक्ति का समाचार जैसे ही चारों ओर फैला, अन्य दरबारी यह सुनकर व्याकुल हो गए।
सभी ने सोचा कि अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बनकर अपने पद का दुरुपयोग कर सकता है। सभी दरबारी समस्या के समाधान के लिए तेनालीराम के पास पहूंचे। तेनालीराम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया।
अगली सुबह राजा नदी किनारे सैर के लिए गए। वहां उन्होंने तेनालीराम को एक काले कुत्ते को जोर से रगड़-रगड़कर नहलाते हुए देखा तो हैरान हो गए। राजा द्वारा कारण पूछने पर तेनालीराम ने बताया, 'महाराज, मैं इसे गोरा बनाना चाहता हूं।'
राजा ने हंसते हुए पूछा, 'क्या नहलाने से काला कुत्ता गोरा हो जाएगा?'
'महाराज, जब एक अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बन सकता है तो यह भी गोरा हो सकता है।' तेनालीराम ने उत्तर दिया।
यह सुनकर राजा तुरंत समझ गए कि तेनालीराम क्या कहना चाहता है। उसी दिन राजा ने दरबार में नाई को पुनः उसका वही स्थान दिया, जिसके लिए वह उपयुक्त था।
20. सोच - समझ कर बोले
एक व्यक्ति ने एक पादरी के सामने अपने पड़ोसी की खूब निंदा कि. बाद में जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो वह पुनः पादरी के पास पहुंचा और उस गलती के लिए क्षमा याचना करने लगा. पादरी ने उससे कहा कि वह पंखो से भरा एक थैला शहर के बीचोबीच बिखेर दे. उस व्यक्ति ने पादरी कि बात सुनकर ऐसा ही किया और फिर पादरी के पास पहुँच गया.
उस व्यक्ति की बात सुनकर पादरी ने उससे कहा कि जाओ और उन सभी पंखो को फिर से थैले में भरकर वापस ले आओ. वह व्यक्ति थोड़ा हिचका पर पादरी का आदेश मानते हुए उसने ऐसा करने की कोशिश की. काफी प्रयत्न करने के बाद भी वह सभी पंखो जमा नहीं कर सका. जब आधा भरा थैला लेकर वह पादरी के सामने पहुंचा तो पादरी ने उससे कहा की यही बात हमारे जीवन में भी लागू होती है.
जिस तरह तुम पंख वापस नहीं ला सकते, उसी तरह तुम्हारे कटु वचन को भी वापस नहीं किया जा सकता. उस व्यक्ति का जो नुकसान हुआ है, अब उसकी भरपाई संभव नहीं है. आलोचना का मतलब नकारात्मक बातें करना और शिकायत करना ही नहीं होता बल्कि आलोचना सकारात्मक भी हो सकती है. आपकी कोशिश यह होनी चहिये की आपकी आलोचना से, आपके द्वारा सुझाये विचारो से उसकी सहायता हो जाएँ.
शिक्षा/Moral:- दोस्तों कई बार देखा गया है कि माँ – बाप के द्वारा बच्चो से की गई बातचीत का ढंग उनके भविष्य कि रूपरेखा भी तय कर देता है. इसलिए घर से लेकर बाहर दोस्तों के साथ कुछ भी कहने में सावधानी बरतें. इसलिए अगर आप समझ कर बोलेंगे तो हमेशा फायदे में रहेंगे.
21. गलती को स्वीकार करो
महात्मा गाँधी और खान अब्दुल गफ्फार खान एक ही जेल में कैद थे. यद्यपि देशी-विदेशी जेलर गाँधी जी का बहुत सम्मान करते थे, किन्तु गाँधी जी भी जेल के नियमो और अनुशासन का सख्ती से पालन करते थे. जेलर के आने पर गाँधी जी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो जाते थे.
खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें सीमान्त गाँधी कहा जाता था, को गाँधी जी का यह तौर-तरीका नापसंद था. उनका कहना था की जो सरकार इस देश पर गलत ढंग से हुकूमत कर रही है, हम भला उसे और उसके संस्थाओ को मान्यता क्यों दे.
गाँधी जी का कहना था की हम जहाँ भी हो हमें वहां के अनुशासन का पालन करना चाहिए. एक दिन सीमान्त गाँधी ने महात्मा गाँधी पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा की ‘आप जेलर’ का सम्मान इसलिए करते है क्योंकि वह आपको नियम से अधिक सुविधाएँ देता है. उदाहरण के लिए हम लोगो को तो हिन्दी या अंग्रेजी का अख़बार मिलता है, लेकिन आपको गुजराती पत्र-पत्रिकाएँ भी मिलती है. आप इसलिए जेलर के अहसानमंद हो गये है. दुसरे दिन से गाँधी जी ने केवल एक ही अख़बार लिया और शेष साहित्य लेने से इंकार कर दिया.
एक महीना बीत गया. गाँधी जी जेलर के प्रति वही सम्मान प्रदर्शित करते रहे जो वे पहले किया करते थे. यह तौर-तरीका भला सीमांत गाँधी की नजर से कैसे चूक सकता था. उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, वे गाँधी जी के पास जाकर माफ़ी मांगने लगे. गाँधी जी ने हंसकर उन्हें गले लगा लिया. दुसरे दिन से सीमांत गाँधी के तेवर भी बदल गये और वे भी जेलर के आगमन पर उसके सम्मान में उठकर खड़े होने लगे.
शिक्षा/Story:- दोस्तों यह कहानी हमें यह बताती है कि व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकार करने में कभी भी नहीं हिचकिचाना चाहिए और हर किसी का सम्मान करना चाहिए. हमें महात्मा गाँधी जी के जीवन से यह जरुर सीख लेनी चाहिए की हमें हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए भले वह इंसान हमारा सम्बन्धी हो या नहीं.