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Friday, 9 June 2023

Short Storie In Hindi | moral short storie in hindi 2023

Moral Short Storie In Hindi 2023 



जब कभी भी moral short storie in hindi 2023 कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।





1. संघर्ष ही जीवन है


जापानियों को ताज़ी मछली खाना बहुत पसंद होता है. ताज़ी मछलियाँ पकड़ने और फटाफट बेचने में वहाँ के मछुआरे डटे रहते हैं. लेकिन एक समस्या थी, जापान के समुद्री तटों पर मछलियाँ बहुत कम मिलती थी.


ढेर सारी मछलियाँ पकड़ने के लिए दूर समुद्र में जाना पड़ता था. सो मछुआरों ने बड़ी नावें तैयार की और गहरे समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़ कर लाने लगे.


लेकिन मछुआरे जितना अधिक दूर जाते, वापस आने में भी उतना अधिक समय लगता. कभी कभी तो 2-3 दिन बीत जाते. इससे पकड़ी हुई मछलियाँ ताज़ी नहीं रह जाती और खाने वाले स्वाद से समझ जाते कि मछली ताजी नहीं थी. इससे मछुआरों की मछलियाँ कम बिकने लगी.


इसका समाधान मछुआरों ने अपनी नावों में फ्रीज़र लगाकर किया. वो मछलियाँ पकड़ते और फ्रीजर में रख देते. इससे मछलियाँ खराब नहीं होती और वे लम्बी दूरी तक जा भी सकते थे.


लेकिन जापानी लोग भी और आगे, वो ताज़ी और जमी हुई मछली के स्वाद का अंतर पकड़ लेते और जमी हुई मछली का स्वाद भी उन्हें नहीं भाता था.


मछुआरों ने फिर यह समाधान निकाला कि नावों में ही छोटे Water Tank बना दिए जाएँ. वे पकड़ी हुई ढेर सी मछलियाँ इस पानी के टैंक में भर देते.


मछलियाँ पहले बहुत संघर्ष करती लेकिन बाद में शांत हो जाती. चूँकि वाटर टैंक में बहुत जगह नहीं होती थी इसलिए मछलियाँ ज्यादा तैर नहीं पाती थी लेकिन वो मछलियाँ मरती भी नहीं थी.


दुर्भाग्य से जापानी इन मछलियों को भी नापसंद करने लगे क्योंकि इन सुस्त, थकी, स्थिर मछलियों का स्वाद ताज़ी मछलियों जैसा था ही नहीं.


अंत में मछुआरों ने इस समस्या का सही समाधान खोज ही निकाला.


मछुआरों ने उसी वाटर टैंक में एक छोटी Shark fish रखना शुरू कर दिया. शार्क कुछ मछलियाँ तो खा जाती थी, लेकिन फिर भी कई मछलियाँ बच जाती थीं. ये बची हुई मछलियाँ जिन्दा और ताज़ी बनी रहती थीं क्योंकि शार्क से बचने के लिए वो निरंतर संघर्ष करती रहती थीं.


जीवन की समस्याएं भी शार्क मछली जैसे ही हैं जो हमें बेहतर बनाने में और अपने अंतर्मन को मजबूत करने में काम आती हैं| हर काम शुरू में मुश्किल होता है, लगातार कठोर परिश्रम से एक दिन वो हमारे लिए आसान भी बन जाता है|






2. तितली का संघर्ष


एक बार एक आदमी को अपने बाग में टहलते हुए किसी एक टहनी में लटकता हुआ एक तितली का कोकून दिखाई पड़ा. अब हर रोज़ वो आदमी उसे देखने लगा और एक दिन उसने ध्यान किया कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया है.


उस दिन वो वहीँ बैठ गया और घंटो उसे देखता रहा. उसने देखा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है, पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो उस छेद से नहीं निकल पायी और फिर वो बिलकुल शांत हो गयी मानो उसने हार मान ली हो.


इसलिए उस आदमी ने निश्चय किया कि वो उस तितली की मदद करेगा. उसने एक कैंची उठायी और कोकून को खोलकर इतना बड़ा कर दिया कि वो तितली आसानी से बाहर निकल सके और यही हुआ, तितली बिना किसी और संघर्ष के आसानी से बाहर निकल आई पर उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख सूखे हुए थे.


वो आदमी तितली को ये सोच कर देखता रहा कि वो किसी भी वक़्त अपने पंख फैला कर उड़ने लगेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वो बेचारी तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और उसे अपनी बाकी की ज़िन्दगी इधर-उधर घिसटते हुए बीतानी पड़ी.


वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरअसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है ताकि ऐसा करने से तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुच सके और वो छेद से बाहर निकलते ही उड़ सके.


शिक्षा/Moral:- वास्तव में कभी-कभी हमारे जीवन में संघर्ष ही वो चीज होती जिसकी हमें सचमुच आवश्यकता होती है| यदि हम बिना किसी struggle के सब कुछ पाने लगे तो हम भी एक अपंग के सामान हो जायेंगे. बिना परिश्रम और संघर्ष के हम कभी उतने मजबूत नहीं बन सकते जितना हमारी क्षमता है.





3. मुश्किलों से सीखें


एक व्यक्ति अपने गधा को लेकर शहर से लौट रहा था । गलती से वह गधा पैर खिसकने के कारण सीधे एक गहरे गढ़े में गिर गया। 


उसे निकलने के लिए उस व्यक्ति ने पूरा कोशिश किया परन्तु वह उस गधे को निकाल नहीं पाया ।


जब उस व्यक्ति को लगा की उसके गधे को उस गढ़े से निकालना अब असंभव हैं उसने उसे जिन्दा ही मिटटी से ढक देने का सोचा और वह ऊपर से मिटटी डालने लगा। 


बहुत देर तक मिटटी डालने के बाद वह इंसान पास ही अपने घर चले गया ।


पर ढेर सारी मिटटी डालने के कारण वह गधा अपने ऊपर गिरे हुए मिटटी की मदद से धीरे-धीरे उस पर अपना पैर रख-रख कर उस गढ़े के ऊपर जिन्दा चढ़ आया। 


अगले दिन जब वह व्यक्ति सुबह उठा तो उसने देखा उसका गधा उसके घर के बहार ही खड़ा था । यह करिश्मा देखकर वह व्यक्ति स्तम्भ रहे गया।


शिक्षा/Moral:- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी हार नहीं मानना चाहिए और बार-बार कोशिश करनी चाहिए।






4. दो पत्थरों की कहानी


नदी पहाड़ों की कठिन व लम्बी यात्रा के बाद तराई में पहुंची। उसके दोनों ही किनारों पर गोलाकार, अण्डाकार व बिना किसी निश्चित आकार के असंख्य पत्थरों का ढेर सा लगा हुआ था। इनमें से दो पत्थरों के बीच आपस में परिचय बढ़ने लगा। दोनों एक दूसरे से अपने मन की बातें कहने-सुनने लगे।


इनमें से एक पत्थर एकदम गोल-मटोल व अत्यंत आकर्षक था जबकि दूसरा पत्थर बिना किसी निश्चित आकार के खुरदरा व अनाकर्षक था।


एक दिन खुरदरे पत्थर ने चिकने पत्थर से पूछा- ‘‘हम दोनों ही दूर ऊंचे पर्वतों से बहकर आए हैं फिर तुम इतने गोल-मटोल व आकर्षक क्यों हो जबकि मैं नहीं?’’


यह सुनकर चिकना पत्थर बोला-“पता है शुरुआत में मैं भी बिलकुल तुम्हारी तरह ही था लेकिन उसके बाद मैं निरंतर कई सालों तक बहता और लगातार टूटता व घिसता रहा हूं|


ना जाने मैंने कितने तूफानों का सामना किया है| कितनी ही बार नदी के तेज थपेड़ों ने मुझे चट्टानों पर पटका है| तो कभी अपनी धार से मेरे शरीर को काटा है| तब कहीं जाकर मैंने ये रूप पाया है।


जानते हो, मेरे पास हेमशा ये विकल्प था कि मैं इन कठनाइयों से बच जाऊं और आराम से एक किनारे पड़ा रहूँ पर क्या ऐसे जीना भी कोई जीना है? नहीं, मेरी नज़रों में तो ये मौत से भी बदतर है!


तुम भी अपने इस रूप से निराश मत हो| तुम्हें अभी और संघर्ष करना है और निरंतर संघर्ष करते रहे तो एक दिन तुम मुझसे भी अधिक सुंदर, गोल-मटोल व आकर्षक बन जाओगे।


मत स्वीकारो उस रूप को जो तुम्हारे अनुरूप ना हो| तुम आज वही हो जो मैं कल था|


कल तुम वही होगे जो मैं आज हूँ या शायद उससे भी बेहतर!”, गोल-मटोल पत्थर ने अपनी बात पूरी की।


शिक्षा/Moral:- संघर्ष में इतनी ताकत होती है कि वो इंसान के जीवन को बदल कर रख देता है। आज आप चाहे कितनी ही विषम पारिस्थति में क्यों न हो संघर्ष करना मत छोड़िये और जब आप ऐसा करेंगे तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो आपको सफल होने से रोक पाएगी।





5. आप हाथी नहीं इंसान हैं


एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा और अचानक रुक गया.


उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!!


ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.


उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं?


तब महावत ने कहा- "इन हाथियों को छोटे से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता रहा है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती कि इस बंधन को तोड़ सकें.


बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”


आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!


इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.


शिक्षा/Moral:-याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए| आप हाथी नहीं इंसान हैं|





6. परमात्मा और किसान


एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जा रही थी|


एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा- देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती-बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा!


किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी हो गई और किसान की ख़ुशी भी क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी!  किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, की फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे|


फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था ,सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी,


बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा- प्रभु ये क्या हुआ?


तब परमात्मा बोले-ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया.


ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया| इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है|


सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है और उसे अनमोल बनाती है!


उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता!


ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे शक्त और प्रखर बनाती हैं| अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है ,प्रतिभाशाली बनना है ,तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा!





7. आलू, अंडा और कॉफ़ी बीन्स


एक दिन एक छोटी सी लड़की अपने पिता को दुख व्यक्त करते-करते अपने जीवन को कोसते हुए यह बता रही थी कि उसका जीवन बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा है । साथ ही उसके जीवन में एक दुख का समय जाता है तो दूसरा चला आ रहा है और वह इन मुश्किलों से लड़ लड़ कर अब थक चुकी है । वह करे तो क्या करे !


उसके पिता प्रोफेशन से एक शाहकार (Chef) थे । अपनी बेटी के इन शब्दों को सुनने के बाद वह अपनी बेटी को रसोईघर लेगया और 3 कढाई में पानी डाल कर तेज आग पर रख दिया । जैसे ही पानी गरम हो कर उबलने लगे, पिता नें एक कढाई एक आलू डाला, दुसरे में एक अंडा और तीसरे में कुछ कॉफ़ी बीन्स दल दिए ।


वह लड़की बिना कोई प्रश्न किये अपने पिता के इस काम को ध्यान से देख रही थी ।


कुछ 15-20 मिनट के बाद उन्होंने आग बंद कर दिया और एक कटोरे में आलू को रखा, दुसरे में अंडे और कॉफ़ी बीन्स वाले पानी को कप में । पिता ने बेटी की तरफ उन तीनों कटोरों दिखाते हुए एक साथ कहा ! आलू, अंडे, और कॉफ़ी बीन्स ।


पिता ने दुबारा बताते हुए बेटी से कहा !


पास से देखो इन तीनों चीजों को –


बेटी ने आलू को देखा जो उबलने के कारण मुलायम हो गया था । उसके बाद अंडा को देखा जो उबलने के बाद अन्दर से कठिन हो गया था । और आखरी में जब कॉफ़ी बीन्स को देखा तो उस पानी से बहुत ही अच्छी खुशबु आरही थी।


पिता ने बेटी से पुछा-क्या तुमको पता चला इसका मतलब क्या है ?


तब उसके पिता ने समझाते हुए कहा इन तीनो चीजों ने अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया किया परन्तु जो मुश्किल उन्होंने झेला वह समान था।


साथ ही उसने अपनी बेटी से प्रश्न किया-जब विपरीत परिस्तिथि तुम्हारे जीवन में आते हैं तो तुम क्या बनना चाहोगे आलू, अंडा या कॉफ़ी बीन्स।


शिक्षा/Moral:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में परिस्तिथि चाहें जितने भी बड़े हो वह उस मनुष्य के ऊपर है कि वह कितना झेल सकता है।






8. ज़िन्दगी के पत्थर, कंकड़ और रेत


Philosophy के एक Professor ने कुछ चीजों के साथ Class में प्रवेश किया. 


जब Class शुरू हुई तो उन्होंने एक बड़ा सा खाली शीशे का जार लिया और उसमे पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े भरने लगे.


Professor ने फिर Students से पूछा- कि क्या जार भर गया है? और सभी ने कहा “हाँ.


तब प्रोफ़ेसर ने छोटे-छोटे कंकडों से भरा एक Box लिया और उन्हें जार में भरने लगे.


जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच settle हो गए.


एक बार फिर प्रोफ़ेसर ने छात्रों से पूछा कि- क्या जार भर गया है? और सभी ने हाँ में उत्तर दिया.


तभी Professor ने एक Sand Box निकाला और उसमे भरी रेत को जार में डालने लगे. रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी और एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने एक साथ उत्तर दिया, ” हाँ”


फिर Professor ने समझाना शुरू किया-” मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपकी Life को Represent करता है.


बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी चीजें हैं- आपकी Family, आपका Partner, आपकी Health आदि| अगर आपकी बाकी सारी चीजें खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी.


ये कंकड़ कुछ अन्य चीजें हैं जो Matter करती हैं- जैसे कि आपकी Job, आपका घर, इत्यादि. और ये रेत बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती है.


शिक्षा/Moral:- अगर आप जार को पहले रेत से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. यही आपकी life के साथ होता है. अगर आप अपनी सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए समय नहीं होगा जो आपके लिए महत्त्वपूर्ण हैं. उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपकी खुशियों के लिए ज़रूरी हैं.





9. क्रोध पर विजय


बहुत प्राचीन बात है। किसी गाँव में एक बुर्जुग महात्मा रहते थे। दूर-दूर से लोग शिक्षा गृहण करने के उद्देश्य से अपने बच्चों को उनके आश्रम में भेजते थे। एक दिन महात्मा जी के पास कमल नाम का एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया।


‘गुरु जी मुझे अपने श्रीचरणों में जगह दे दीजिए। अब मेरी कोई कामना बाकी नहीं रही है। मैं आश्रम में रहकर आपके आज्ञानुसार समाज को अभी तक प्राप्त किया हुआ ज्ञान वितरित करना चाहता हूँ।‘ पारखी वृद्ध महात्मा ने एकदम समझ लिया कि यह व्यक्ति काबिल है, इसकी कामना सच्ची है और यह समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने के लिए कृतसंकल्पित है।


कमल उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना किये जा रहा था-गुरु जी! मुझे अपने श्रीचरणों में स्थान दें।


महात्मा जी ने कहा-‘पुत्र! आश्रम की परम्परा है कि तुम स्नान करके पवित्र हो और भगवान के आगे संकल्प धारण करो कि अपना कृतव्य सही तरीके से निभाओगे। अतः इस कार्य के लिए तुम कल प्रातः स्नान करके आश्रम आ जाना।’


उसके जाते ही वृद्ध महात्मा जी ने साफ-सफाई का कार्य करने वाली महिला को अपने पास बुलाया और कहा ‘कल सुबह यह नया शिक्षक आयेगा। जैसे ही यह आश्रम के नजदीक आये, तुम इस प्रकार से झाड़ू लगाना कि उसके चेहरे पर धूल गिर जाए। लेकिन यह कार्य थोड़ा सावधानी से करना। वह तुम पर हाथ भी छोड़ सकता है। महिला महात्मा जी की बहुत सम्मान करती थी। उसने उनकी आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया।


अति प्रसन्न मुद्रा में कमल नहा-धोकर इठलाता हुआ आश्रम आने लगा। जैसे ही वह नजदीक पहुँचा, महिला ने तेजी से झाड़ू लगाना शुरू कर दिया। कमल के पूरे चेहरे में धूल चली गई। उसके क्रोध की सीमा न रही। पास पड़े पत्थर को उठाकर वह महिला को मारने के लिए दौड़ा। महिला पहले ही सावधान थी। वह झाड़ू फैंक-फांक के वहाँ से भाग खड़ी हुई। अधेड़ के मुख में जो आया बकता चला गया।


कमल वापिस घर गया और दुबारा स्नान करके महात्मा के पास लौटा।


महात्मा जी ने कहा-‘अभी तो तुम जानवरों के समान लडने के लिए दौड़ते-चिल्लाते हो। तुमसे अभी यहाँ शिक्षण कार्य नहीं होगा। तुम एक वर्ष के बाद आना तब तक जो कार्य करते हो वही करते रहो।’


कमल की इच्छा सच्ची थी। उसकी महात्मा में श्रद्धा भी सच्ची थी। वर्ष पूरा होते ही वह फिर महात्मा जी के समीप उपस्थित हुआ।


महात्मा जी ने आदेश दिया- ‘पुत्र तुम कल स्नान करके प्रातः आना।’


कमल के जाते ही महात्मा जी ने सफाई कर्मचारी को बुला कर कहा-‘वह फिर आ रहा है। इस बार मार्ग में झाड़ू इस तरह से लगाना कि धूल के साथ-साथ उस पर झाड़ू की हल्की सी चोट भी लग जाए। डरना मत, वह तुम्हें मारेगा नहीं। कुछ भी बोले तो चुपचाप सुनते रहना।’


अगले दिन स्नान-ध्यान करके वह व्यक्ति जैसे ही द्वार तक पहुंचा। महिला झाड़ू लगाते हुए पहुंच गयी। महिला ने आदेशानुसार जानबूझकर झाड़ू उस पर इस प्रकार से छुआ कि कपड़े भी गंदे हो गये।


कमल को बहुत क्रोध आया, पर झगड़ने की बात उसके मन में नहीं आयी। वह केवल महिला को गालियाँ बक कर फिर स्नान करने घर लौट गया।


जब वह महात्मा जी के पास वापिस पहुंचा, संत ने कहा-‘तुम्हारी काबिलियत में मुझे संदेह है। एक वर्ष के बाद यहाँ आना।’


एक वर्ष और बीत गया। कमल महात्मा जी के पास आया। उसे पूर्व के भांति स्नान-ध्यान करके आने की आज्ञा मिली।


महात्मा जी ने उसके जाते ही उसी महिला को फिर बुलाया- ‘इस बार सुबह जब वह आये तो तुम इस बार अपनी कचड़े की टोकरी उस पर उड़ेल देना।’


साफ-सफाई करने वाली महिला डर गयी। 


महिला ने कहा- ‘वह तो अति कठोर स्वभाव का है। ऐसा करने पर तो वह अत्यंत क्रोधित होगा और मार-पीट पर उतर जायेगा।’


महात्मा जी ने उसे आश्वासन दिया-‘चिन्ता मत करो। इस बार वह कुछ नहीं कहेगा। इसलिए तुम्हें भागने की आवश्यकता नहीं है।’


सुबह जैसे ही कमल आश्रम पहुँचा। महिला ने अनजान बनकर पूरा कूड़ा-कचरा उस पर उड़ेल दिया।


पर यह क्या! इस बार न तो वह गुस्सा हुआ और न ही मार-पीट के लिए दौड़ा।


कमल ने कहा- ‘माता! आप मेरी गुरु हैं। ’ 


कमल ने महिला के सामने अपना मस्तक झुका कर कहा... ‘आपने मुझ मूर्ख-अभिमानी पर अति कृपा की है।


आपके सहयोग से मैंने अपने बड़प्पन के अहंकार और क्रोध-रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त की है।


वह दुबारा घर गया। स्नान करके आश्रम में उपस्थित हुआ।


इस बार महात्मा जी ने उसे गले लगा लिया और बोले- ‘पुत्र! तुमने अपने क्रोध पर काबू पा लिया है अतः अब तुम आश्रम में कार्य करने के सच्चे अधिकारी हो।






10. हर व्यक्ति के जीवन की एक कहानी है


एक बार एक 26 साल का लड़का और उसका पिता रेलगाड़ी (Train) में सफ़र कर रहे थे।


वह लड़का बार-बार train की खिड़की से झाँक रहा था और बहार दिखते हुए पेड़ पौधों को देखकर जोर-जोर से चिल्ला रहा था और हंस रहा था ।


पास ही में एक शादी-शुदा जोड़ा बैठे थे वह यह सब देखकर हंस रहे थे।


तभी उस 26 साल के लड़के के पिता ने अपने बेटे से कहा- देखो बेटा… बाहर असमान में बादलों को देखो वह भी हमारे साथ दौड़ लगा रहे हैं।


यह पागलपना देखकर उस शादी-शुदा जोड़े को सहन नहीं हुआ और वह उस लड़के के पिता से बोल बैठे!


शादी-शुदा जोड़े बोले- आप अपने बेटे को किसी डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते?


यह सुनकर उस लड़के के पिता ने उत्तर दिया!- हाँ , हम डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं।


दरसल मेरा बेटा देख नहीं सकता था पर आज उसके आँखों के सफल ऑपरेशन के कारण वह देख पा रहा है और आज वह बहुत खुश है।


इस पुरे पृथ्वी में हर किसी व्यक्ति के जीवन में एक कहानी है।


शिक्षा/Moral:- हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी व्यक्ति के विषय में पूरी जानकारी न होने पर उसके विषय में टिपण्णी करना बिलकुल गलत बात है।




Thursday, 8 June 2023

Moral Short Storie In Hindi 2023

 Moral Short Storie In Hindi 2023


जब कभी भी moral short storie in hindi 2023 कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।




कुम्हार और सुराही


एक सुराही थी, वह बहुत ही सुंदर थी, उस पर सुंदर - सूंदर बेल, बूटे, फूल और चित्रकारी बनी हुई थी।


भीमा कुम्हार सुराही को बार-बार देखता और खुश हो मन ही मन सोचता कि मेरी मेहनत से ही सुराही इतनी सुंदर बनी है।


भीमा कुम्हार बहुत थका हुआ था, सोचते - सोचते उसे नींद आ गयी और वह वही सो गया। नींद लगते ही वह सपना देखने लगा।


उसने सपने में देखा कि सुराही के पास रखी मिट्टी हिली और कहने लगी- "सुराही ओ सुराही, मैने तुम्हें बनाया सूंदर रूप तुम्हारा मुझसे ही हैं आया"


मिट्टी की आवाज सुन पास में रखे बाल्टी का पानी छलका और बोला- "सुराही ओ सुराही, मैने तुम्हें बनाया सूंदर रूप तुम्हारा मुझसे ही हैं आया"


मिट्टी और पानी की बात सुनकर चाक भी चुप नहीं रह पाया, उसने बोला - तुम दोनों थे कीचड़ मिट्टी इस सचाई को जान लो बनी सुराही मेरे कारण इस बात को तुम मान लो।


पानी मिट्टी और चाक की बात सुनकर बुझती आग भी कहने लगी- तुमसब बातें कच्ची करते, कच्चा है काम तुम्हारा तपकर मुझमे बनी सुराही असली काम हमारा।


भीमा कुम्हार ने सपने में सबकी बातें सुनी और बोला - सब चुप हो जाओ, चलो सुराही से ही पूछते है कि उसे बनाने में किसका सहयोग ज्यादा हैं।


सुराही ने जब यह सवाल सुना तो वह बोली- किसी एक का काम नही ये सबकी मेहनत सबका काम, मिलजुल कर कर सकते है अच्छे - अच्छे सूंदर काम..!!


सुराही ने समझाया कि मुझे बनाने में कुम्हार, मिट्टी, पानी चाक सबका बराबर सहयोग हैं। सुराही की बात सबको समझ आ गयी और वे आपस में मिलजुल कर रहने लगे।






शेर और चार मित्र


एक समय की बात हैं। किसी गाँव में चार दोस्त रहते थे। उनमें से तीन बहुत ही पढ़े- लिखे विद्वान थे, जबकि चौथा दोस्त मूर्ख था। चारों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। वे हमेशा एक साथ रहते और बातें खूब करते थे।


एक दिन की बात हैं। वे एक पेड़ के नीचे बैठे बातें कर रहे थे कि अब हमें कुछ काम करने के लिये पास के नगर में जाना चाहिये। चारों इस बात से राजी हो गये, अगले दिन वे अपना सामान लेकर नगर की तरफ निकल गये।


रास्ता में सुनसान जंगल पड़ता था। वे पेड़ - पौधें जीव - जंतुओं के बारे में बातें करते जा रहे थे।


रास्ते में उन्हें किसी जानवर के हड्डियों का ढाँचा मिला, वह बिखरा हुआ था।


पहला दोस्त बोला- मै हड्डियों के जोड़ने की जादुई विद्या समझता हूँ। देखो में अभी इन्हें जोड़ देता हूँ।


उसने अपने जादुई विद्या से तुरंत उस बिखरे हड्डियों को आपस में जोड़ दिया।


दूसरा दोस्त बोला- मै हड्डियों में माँस, चमड़े, नाखून यह सब लगाने की जादुई विद्या जनता हूँ।


उसने अपनी जादुई विद्या से तुरंत उस कंकाल में मांस, चमड़े, नाखून और बाल आदि लगा दिए।


वह एक शेर का कंकाल था। उसके जादू से वह कंकाल अब मरे हुये शेर में परिवर्तित हो गया।


तीसरा दोस्त बोला- मै मरे हुये जानवरों को जिंदा करने की जादुई विद्या जनता हूँ। देखो में अभी इसे जिंदा कर देता हूँ।


यह सुनकर चौथा दोस्त बोला- रुको दोस्त, यह शेर जिंदा होते ही हमें खा जायेगा इसलिये तुम इसे जिंदा मत करो।


लेकिन तीसरे दोस्त ने- चौथे दोस्त की बातों पर ध्यान नहीं दिया और उसने उस शेर को जिंदा करने का जादू लगाना शुरू कर दिया| यह देख चौथा दोस्त भाग कर पेड़ पर चढ़ गया, तीनों दोस्त शेर के जिंदा होने का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर में वह शेर जिंदा हो गया और जोर - जोर से दहाड़ने लगा, उसे देख तीनों दोस्त भागने लगे, लेकिन शेर ने एक ही छलाँग में उन्हें मार डाला।


शिक्षा:- हमें हमेशा सोच - समझ कर ही कोई फैसला करना चाहिये।





साधू की झोपड़ी


एक गाँव के पास दो साधू अपनी अपनी झोपड़ियाँ बना कर रहते थे। दिन के वक्त वह दोनों गाँव जा कर भिक्षा मांगते और उसके बाद पूरा दिन पूजा-पाठ करते थे।


एक दिन भारी तूफान और आँधी आने के कारण उनकी झोपड़ियाँ जगह-जगह से टूट-फूट गयीं और बहुत हद तक बर्बाद हो गयीं।


पहला साधू यह सब देख कर दुखी हो गया|


पहला साधू बोला- हे ईश्वर ! तूने मेरे साथ यह अनर्थ क्यों किया। क्या मेरी भक्ति, तप, जप और पूजा का यही पुरस्कार है?


इस तरह वह पूरा दिन बड़बड़ाते हुए, अपना जी जलाते हुए वहीं एक पेड़ के नीचे बैठ गया।


तभी वहाँ दूसरा साधू आ पहुंचा-उसने अपनी बर्बाद जोपड़ी देखी तो वह मुस्कुराने लगा और उसी वक्त ऊपरवाले का धन्यवाद करने लगा।


दूसरे साधु ने कहा कि-ऐसे भीषण तूफान में तो पक्के मकान भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं पर तूने तो मेरी आधी झोपड़ी बचा ली।


आज यह बात सिद्ध हो गयी की तू मेरी भक्ति से कितना प्रसन्न है और तेरी मुझ पर कितनी बड़ी कृपा है।


शिक्षा:- हर अच्छी बुरी घटना के दो पहलू होते हैं। बुरा निष्कर्ष निकालना या फिर अच्छा अर्थ निकालना यह दोनों ही आपके हाथ में है।





घास, बकरी और भेड़िया


एक बार की बात है एक मल्लाह के पास घास का ढेर, एक बकरी और एक भेड़िया होता है। उसे इन तीनो को नदी के उस पार लेकर जाना होता है।


पर नाव छोटी होने के कारण वह एक बार में किसी एक चीज को ही अपने साथ ले जा सकता है।


अब अगर वह अपने साथ भेड़िया को ले जाता तो बकरी घास खा जाती।


अगर वह घास को ले जाता तो भेड़िया बकरी खा जाता।


इस तरह वह परेशान हो उठा कि करें तो क्या करें?


उसने कुछ देर सोचा और फिर उसके दिमाग में एक योजना आई।


सबसे पहले वह बकरी को ले कर उस पार गया और वहाँ बकरी को छोड़ कर, वापस इस पार अकेला लौट आया।


उसके बाद वह दूसरे सफर में भेड़िया को उस पार ले गया। और वहाँ खड़ी बकरी को अपने साथ वापस इस पार ले आया।


इस बार उसने बकरी को वहीँ बाँध दिया और घास का ढेर लेकर उस पार चला गया और भेड़िया के पास उस ढेर को छोड़ कर अकेला इस पार लौट आया।


फिर अंतिम सफर में बकरी को अपने साथ ले कर उस पार चला गया।


शिक्षा:-मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खोजने पर समाधान मिल ही जाता है।





सात बहनें और गणेश जी


एक बार की बात है। सात बहनें थी। छः बहनें पूजा-पाठ करती थीं लेकिन सातवीं बहन नहीं।


एक बार गणेशजी ने सोचा मैं इन सात बहनों की परीक्षा करता हूँ। वे साधु के रूप में आए और दरवाजा खटखटाया।


पहली बहन से गणेशजी ने कहा- मेरे लिए खीर बना दो, मैं बड़ी दूर से आया हूँ। उसने मना कर दिया। ऐसे छः बहनों ने मना कर दिया।


लेकिन सातवीं बहन ने हाँ कह दी- उसने चावल बीनना शुरू किए और फिर खीर बनाना शुरू की।


अधपकी खीर उसने चख भी ली फिर साधु महाराज को खीर दी।


साधु ने कहा- तुम भी खीर खा लो।


सातवीं बहन ने कहा- मैंने तो खीर बनाते-बनाते ही खा ली है।


यह सुनते ही गणेशजी साधु से अपने पहले वाले रूप में आ गए


गणेशजी ने सातवीं बहन से कहा- मैं तुम्हें स्वर्ग ले जाऊँगा।


बहन ने कहा कि मैं अकेले स्वर्ग नहीं जाऊँगी। मेरी छः बहनों को भी ले चलिए।


गणेशजी खुश हुए और सबको स्वर्ग ले गए।


स्वर्ग में मजे से घूमने के बाद सभी बहने अपने घर वापिस आ गए और सभी खुश होकर एक साथ रहने लगे।






बच्चे और गुब्बारे वाला


एक बार एक गांव में मेला हो रहा था। मेले में बहुत सारे लोग अपने परिवार के साथ घूमने आए थे।


मेले में बहुत सारे मिठाईयों की दुकान, खिलौने, और गुब्बारे बेचने वाले भी थे। एक कोने में एक गुब्बारे वाला अपने साइकिल पर गुब्बारे बेच रहा था।


तभी उसके पास एक छोटा सा बच्चा आया और उससे पूछने लगा – गुब्बारे वाले यह जो लाल वाला गुब्बारा है क्या यह ऊपर उड़ेगा?


तभी उस गुब्बारे वाले ने उत्तर दिया – हां यह लाल वाला गुब्बारा ऊपर उठेगा।


उसी समय उस बच्चे ने दोबारा गुब्बारे वाले से प्रश्न किया – क्या यह नीला वाला गुब्बारा ऊपर उड़ेगा?


गुब्बारे वाले ने दोबारा उत्तर दिया – हां बच्चे यह गुब्बारा ऊपर उड़ेगा। उस बच्चे ने तीसरी बार फिर से प्रश्न किया – गुब्बारे वाले क्या यह हरा वाला गुब्बारा ऊपर हवा में उड़ेगा?


यह सुनकर उस गुब्बारे वाले ने हंसते हुए उस बच्चे को जवाब दिया – हां बच्चे यह सभी गुब्बारे हवा में उड़ेंगे।


बेटा, गुब्बारा हवा में जाएगा या नहीं यह उसके रंग और आकार पर निर्भर नहीं होता है बल्कि वह तो उसके अंदर में भरे हुए हवा या गैस पर निर्भर करता है।


शिक्षा:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जिस प्रकार गुब्बारे के बाहर के रंग और आकार पर गुब्बारे का ऊपर उड़ना निर्भर नहीं होता उसी प्रकार हमारा भी ऊपर उठना या सफलता प्राप्त करना हमारे बाहरी रंग रूप, हमारे व्यक्तिमत्व पर, हमारी क्षमताओं पर, हमारी योग्यताओं पर निर्भर नहीं होता यह सब तो केवल गुब्बारे रंग है। हमारा ऊपर उठना या हमारी सफलता को छूना हमारे मनोभाव, धारणाओं, हमारी मनोदृष्टि पर निर्भर करते है।





मुन्ना हाथी


मुन्ना हाथी का कारोबार सारे जंगल में फैला था। सारे पेड़-पौधों पर उसका एकछत्र अधिकार था। जहां भी उसकी तबीयत होती वहां जाकर पेड़ों की डालें तोड़ता, पत्ते चबाता और पेड़ हिला डालता।


किसकी मजाल कि उसे रोके। जंगल में शेर ही उसकी बराबरी का जानवर था किंतु उसे पेड़-पौधों से क्या लेना-देना? उसे जानवरों के मांस से मतलब था।


मुन्ना खूब पत्ते खाता, घूमता और मौज करता। एक दिन जंगल के रास्ते से कारों का काफिला निकला। रंग-बिरंगी कारें देखकर मुन्ना का भी मूड हो गया कि वह भी कार में घूमे, हॉर्न बजाकर लोगों को सड़क से दूर हटाए और सर्र से कट मारकर आगे निकल जाए।


दौड़कर वह टिल्लुमल के शोरूम में जा पहुंचा और टिल्लुमल से अच्छी-सी कार दिखाने को कहा। टिल्लु चकरा गया। अब हाथी के लायक कार कहां से लाए।


टिल्लुमल बोला हाथी से- 'भैया तुम्हारे लायक कार कहां मिलेगी? इतनी बड़ी कार तो कोई कंपनी नहीं बनाती।'


परंतु मुन्नाभाई ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली कि कार लेकर ही जाएंगे।


टिल्लुमल ने समझाना चाहा- 'अरे भाई, तुम्हारे लायक कार कंपनी को अलग से आदेश देकर बनवाना पड़ेगा"।


मुन्ना हाथी झल्लाकर बोला- 'तो बनवाओ, इसमें क्या परेशानी है?'


मुन्ना हाथी चीखा-'बहुत बड़ी कार बनेगी तो बनने दो, तुम्हें क्या कष्ट है।


टिल्लुमल बोला- 'जब कार चलेगी तो जंगल के बहुत से पेड़ काटने पड़ेंगे।'


मुन्ना हाथी बोला- 'क्यों... क्यों... काटना पड़ें ?


टिल्लु ने समझाना चाहा- 'कार इतनी बड़ी होगी तो पेड़ तो काटना ही पड़ेंगे मुन्ना भैया', 'क्या पेड़ काटना ठीक होगा अपने जरा से शौक के लिए?'


'अरे टिल्लुमलजी, कार के लिए पेड़ काटना! अपनी मौज-मस्ती के लिए जंगल काटे, यह मुझे स्वीकार नहीं है। जंगल ही तो जीवन है, ऐसा कहकर वह जंगल वापस चला गया।





चतुर किसान


एक बार एक किसान एक बकरी, घास का एक गट्ठर और एक शेर को लिए नदी के किनारे खड़ा था।


उसे नाव से नदी पार करनी थी लेकिन नाव बहुत छोटी थी वह सारे सामान समेत एक बार में पार नहीं कर सकता था।


किसान ने कुछ तरकीब सोची। वह अगर शेर को पहले ले जाकर नदी पार छोड़ आता है तो इधर बकरी घास खा जाएगी और अगर घास को पहले नदी पार ले जाता है तो शेर बकरी खा जाएगा।


अंत में उसे एक समाधान सूझ गया। उसने पहले बकरी को साथ में लिया और नाव में बैठकर नदी के पार छोड़ आया।


इसके बाद दूसरे चक्कर में उसने शेर को नदी पार छोड़ दिया लेकिन लौटते समय बकरी को फिर से साथ ले आया।


इस बार वह बकरी को इसी तरफ छोड़कर घास के गट्ठर को दूसरी और शेर के पास छोड़ आया।


इसके बाद वह फिर से नाव लेकर आया और बकरी को भी ले गया।


इस प्रकार उसने नदी पार कर ली और उसे कोई हानि भी नहीं हुई।






भाग्य अपना अपना


एक किसान था। उसके पास एक बकरा और दो बैल थे। बैलों से वह खेत जोतने का काम लेता। दोनों बैल दिन भर कड़ी मेहनत करके खेतों की जुताई करते थे।


इसके उल्टे बकरे के लिए कोई काम तो था नहीं। वह दिन भर इधर-उधर घूमकर हरी-हरी घास चरता रहता। खा पीकर वह काफी मोटा तगड़ा हो गया था।


यह देखकर बैल सोचते कि इस बकरे के मजे हैं। कुछ करता-धरता तो है नहीं और सारा दिन इधर-उधर घूमकर खाता रहता है।


इधर, बकरा बैलों की हालत देखता तो उसे भी बड़ा दुख होता कि बेचारे सारा दिन हल में जुते रहते हैं और मालिक है कि इनकी ओर पूरी तरह ध्यान नहीं देता। वह बैलों को कुछ सलाह देना चाहता था, जिससे इनका कुछ भला हो।


एक दिन दोनों बैल खेत जोत रहे थे। बकरा भी वहीं खेतों के पास घास चर रहा था। दोनों बैलों को खेत जोतने में काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। वे दोनों हांफ रहे थे।


यह देखकर बकरा मूर्खतापूर्ण स्वर में बोला- ”भाइयो, तुम दोनों को दिन भर खेतों में कड़ी मेहनत करते देखकर मुझे बहुत दुख होता है। परंतु किया क्या जा सकता है, यह तो भाग्य का खेल है। मुझे देखो, मेरे पास दिन भर चरने के अलावा कोई काम नहीं है।


दिन भर मैं इधर-उधर मैदानों में चरता रहता हूं। किसान की पत्नी खुद खेतों में जाती है और मेरे लिए हरी पत्तियां और घास लेकर आती है। तुम दोनों तो मुझसे ईर्ष्या करते होगे।“


दोनों बैल चुपचाप बकरे की बातें सुनते रहे। जब वे शाम को खेतों से काम करके वापस आए तो उन्होंने देखा कि किसान की पत्नी किसी कसाई से धन लेकर उसे वह बकरा बेच रही थी।


दोनों बैलों- की आंखों में आंसू भर आए। बेचारे कर भी क्या सकते थे।


उनमें से एक धीमे स्वर में बोला- ‘आह! तुम्हारे भाग्य में यही लिखा था।’


शिक्षा:- जिसके भाग्य में जैसा लिखा होता है, वैसा ही होता है।





बातूनी कछुआ


एक बार एक समय पर कंबुग्रीव नामक कछुआ एक झील के पास रहता था। दो सारस पक्षी जो उसके दोस्त थे उसके साथ झील में रहते थे। एक बार गर्मियों में, झील सूखने लगी, और उसमें जानवरों के लिए थोड़ा सा पानी बचा था।


सारस ने कछुए को बताया कि दूसरे वन में एक दूसरी झील है जहाँ बहुत पानी है, उन्हें जीवित रहने के लिए वहां जाना चाहिए।


वे योजना के अनुसार कछुए के साथ वहां जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक छड़ी को लिया और कछुए को बिच में मुँह से पकड़कर रखने को कहा और कहा कि अपने मुंह को खोलना नहीं,चाहे कोई भी बात हो। कछुआ उनकी बात मान गया।


कछुए ने छड़ी के बिच को अपने दांतों से पकड़ा और दोनों सरसों ने छड़ी के दोनों कोने को अपने चोंच से पकड़ लिया।


रास्ते में गांवों के लोग कछुए को उड़ते हुए देख रहे थे और बहुत आश्चर्यचकित थे। उन दो पक्षियों के बारे में जमीन पर एक हंगामा सा मच गया था जो एक छड़ी की मदद से कछुए को ले जा रहे थे। सरसों की चेतावनी के बावजूद,


कछुआ ने अपना मुंह खोला और कहा-“यह सब हंगामा क्यों हो रहा है?”


ऐसा कहते ही कछुआ नीचे गिर गया और उसकी मौत ही गई।


शिक्षा:- जितना आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए। बेकार की बात ज्यादा करने से हानी स्वयं को ही होती है।



Wednesday, 7 June 2023

Short Storie In Hindi 2023

 Short Storie In Hindi 2023


जब कभी भी short stories in hindi 2023 कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।




1. बिना विचारे काम मत करो


एक किसान ने एक नेवला पाल रखा था | नेवला बहुत चतुर और स्वामीभगत था | एक दिन किसान कहीं गया था | किसान की स्त्री ने अपने छोटे बच्चे को दूध पिला कर सुला दिया और नेवले को वहीं छोड़ कर वह गड़ा और रस्सी लेकर कुएं पर पानी भरने चली गई |


किसान की स्त्री के चले जाने पर वहां एक काला सांप बिल में से निकल आया | बच्चा पृथ्वी पर कपड़ा बिछाकर सुलाया गया था और सांप बच्चे की ओर ही आ रहा था | नेवले ने यह देखा तो सांप के ऊपर टूट पड़ा और उसने सांप को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर डाला और घर के दरवाजे पर किसान की स्त्री का रास्ता देखने गया |


किसान की स्त्री घड़ा भर कर लौटी उसने घर के बाहर दरवाजे पर नेवले को देखा नेवले के मुख्य वक्त लगा देखकर उसने समझा कि इसने मेरे बच्चे को काट डाला है | दुख और क्रोध के मारे भरा घड़ा उसने नेवले पर पटक दिया बेचारा नेवला कुचल कर मर गया |


वह स्त्री दौड़कर घर में आई उसने देखा कि उसका बच्चा सुख से सो रहा है | वहां एक काला सांप कटा पड़ा है | स्त्री को उसकी भूल का पता लग गया वह दौड़ कर फिर नेवले के पास आई और नेवले को गोद में उठा कर रोने लगी लेकिन अब उसने रोने से क्या लाभ ?


इसलिए कहा है – बिना विचारे जो करें, सो पाछे पछताए | काम बिगारे आपनो, जग में होत हंसाय ||





2. दया का फल


बादशाह सुबुतगिन पहले बहुत गरीब था | एक साधारण सैनिक था | एक दिन वह बन्दुक लेकर घोड़े पर बैठकर जंगल में शिकार खेलने गया था | उस दिन उसे बहुत दौड़ना और हैरान होना पड़ा | बहुत दूर जाने पर उसे एक हिरणी अपने छोटे बच्चे के साथ दिखाई पड़ी | सुबुतगिन ने उसके पीछे दौड़ा दौड़ा दिया |


हिरणी डर के मारे भाग कर एक झाड़ी में छिप गई; लेकिन उसका छोटा बच्चा पीछे छूट गया | सुबुतगिन ने हिरण के बच्चे को पकड़ लिया और उसके पैर बांधकर घोड़े पर उसे लाद लिया | बहुत ढूढने ने पर भी जब हिरणी नहीं मिली तो बच्चे को लेकर ही वह लोट पड़ा |


हिरण ने देखा कि उसके बच्चे को शिकारी बांधकर लिए जा रहा है | वह अपने बच्चे के मोह से झाड़ी से निकल आई | और सुबुतगिन के घोड़े के पीछे पीछे दौड़ने लगी बहुत दूर जाकर सुबुतगिन ने पीछे देखा | अपने पीछे हिरणी को दौड़ता देख उसे आश्चर्य हुआ और दया आ गई | उसने उसके बच्चे के पैर खोल कर घोड़े से उतार दिया | हिरणी प्रसन्न होकर अपने बच्चे को लेकर भाग गई |


Hindi Kahani उस दिन घर लौट कर जब रात में सुबुतगिन सोया तो उसने एक स्वप्न देखा | उससे कोई देवदूत कह रहा था – ” सुबुतगिन ! तू ने आज एक गरीब हिरणी पर जो दया की है | परमात्मा ने तेरा नाम बादशाहों की सूची में लिख लिया है | तू एक दिन बादशाह बनेगा” सुबुतगिन का स्वप्न सच्चा था | वह आगे चलकर बादशाह हुआ |


 शिक्षा: “एक हिरणी पर दया करने का जो जीवो पर दया करता है | उस पर भगवान अवश्य प्रसन्न होते हैं ||”






3. पिता और पुत्र


एक जवान बाप अपने छोटे पुत्र को गोद में लिए बैठा था | कहीं से उड़कर एक कौवा उसके सामने खपरैल पर बैठ गया |


पुत्र ने पिता से पूछा – ” यह क्या है ”

पिता – ” कोआ है ”

पुत्र ने फिर पूछा – ” यह क्या है ”

पिता ने फिर कहा – ” यह कोआ है ”

पुत्र बार-बार पूछता था -” क्या है ”

पिता स्नेह से बार-बार कहता था – ” कोआ है ”

कुछ वर्षों में पुत्र बड़ा हुआ और पिता बुड्ढा हो गया | पिता चारपाई पर बैठा था | घर में कोई उसके पुत्र से मिलने आया | पिता ने पूछा – ” कौन आया है |”

पुत्र ने नाम बता दिया थोड़ी देर में कोई और आया | और पिता ने फिर पूछा | इस बार झल्लाकर पुत्र ने कहा – “आप चुपचाप पढ़े क्यों नहीं रहते | आपको कुछ करना धरना तो है नहीं ! कौन आया है कौन गया यह टाय-टाय दिनभर क्यों लगाए रहते हैं |

पिता ने लंबी सांस खींची | हाथ से सिर पकड़ा | बड़े दुख भरे स्वर में धीरे-धीरे वह कहने लगा | मेरे एक बार पूछने पर तुम क्रोध करते हो | और तुम सैकड़ों बार पूछते थे | एक ही बात -” यह क्या है ” ! मैंने कभी तुम्हें झिकड़ा नहीं ! ” मैं बार-बार बताता कोआ है |”

कहानी की शिक्षा: ” अपने माता पिता का तिरस्कार करने वाले ऐसे लड़के बहुत बुरे माने जाते हैं | तुम सदा इस बात का ध्यान रखो कि माता-पिता ने तुम्हारे पालन पोषण में कितना कष्ट उठाया है | और तुमसे कितना प्यार किया है |”




4. ईश्वर सब कहीं है


दातादीन अपने लड़के गोपाल को नित्य शाम को सोने से पहले कहानियां सुनाया करता था | एक दिन उसने गोपाल से कहा -” बेटा ! एक बात कभी मत भूलना कि भगवान सब कहीं है |”

गोपाल ने इधर-उधर देखा पूछा- ” पिताजी ! भगवान सब कहीं हैं, वह मुझे तो कहीं दिखते नहीं |”

दातादीन ने कहा – ” हम भगवान को देख नहीं सकते किंतु | वह सब कहीं हैं | और हमारे सब कामों को देखते रहते हैं |

गोपाल ने पिता की बात याद कर ली | कुछ दिन बाद अकाल पड़ा | दातादीन के खेतों में कुछ हुआ नहीं | एक दिन गोपाल को लेकर रात के अंधेरे में वह गांव से बाहर गया | वह दूसरे किसान के खेत में से चोरी से एक गठा अन्न काटकर घर लाना चाहता था | गोपाल को मेड पर खड़ा करके उसने कहा -” तुम चारों और देखते रहो ! कोई इधरआवे या देखे तो मुझे बता देना |

जैसे ही दातादीन खेत में अन्न काटने बैठा गोपाल ने कहा -” पिताजी ! रुकिए |”

दातादीन ने पूछा – ” क्यों कोई देखता है ! क्या |”

गोपाल ने कहा – “हां ! देखता है |”

दातादीन खेत से निकलकर मेड पर आया | उसने चारों ओर देखा जब कोई कहीं न दिखा तो उसने पुत्र से पूछा – ” कहां ! कौन देखता है |”

गोपाल -” आपने ही तो कहा था कि ईश्वर सब कहीं है और सबके काम देखता है | तब वह आप को खेत काटते क्या नहीं देखेगा | दातादीन पुत्र की बात सुनकर लज्जित हो गया |

चोरी का विचार छोड़कर वह घर लौट आया |






5. मेल की शक्ति


मातादीन के 5 पुत्र थे – शिवराम, शिवदास, शिवलाल, शिवसहाय और शिवपूजन | ये पांचो लड़के परस्पर झगड़ा किया करते थे | छोटी सी बात पर आपस में तू-तू मैं-मैं करने लगते और गुत्थमगुत्थी कर लेते थे |

मातादीन अपने लड़कों के झगड़े से बहुत ऊब गया था | उसने एक दिन उन्हें समझाने के विचार से पास बुलाया | पहले से पतली-पतली सुखी पाच टहनियों का उसने एक छोटा गट्ठर बना लिया था | पुत्रों से उसने कहा – ” तुम में से जो इन कहानियों के गट्ठर को तोड़ देगा, उसे एक रुपए का पुरस्कार मिलेगा |”

पांचो लड़के झगड़ने लगे कि गट्ठर को वो पहले तोड़ेंगे | उन्हें डर था कि यदि दूसरा भाई पहले तोड़ देगा तो रुपया उसी को मिल जाएगा | मातादीन ने कहा – ” पहले छोटे भाई शिवपूजन को तोड़ने दो |”

शिवपूजन ने गट्ठर उठा लिया और जोर लगाने लगा | दांत दबाकर, आंख मीच कर बहुत जोर उसने लगाया | सिर पर पसीना आ गया; किंतु गट्ठर की टहनीया नहीं टूटी | उसने गट्ठर शिवसहाय को दे दिया | उसने भी जोर लगाया, पर तोड़ नहीं सका | सब लड़कों ने बारी-बारी से गट्ठर लिया और जोर लगाया ; किंतु कोई उसे तोड़ने में सफल नहीं हुआ |

मातादीन ने गट्ठर खोलकर एक-एक टहनी सब लड़कों को दे दी | इस बार सभी ने टहनियों को फटाफट तोड़ दिया | अब मातादीन बोला – ” देखो यह टहनियां जब तक एक साथ थी | तुममें से कोई उन्हें तोड़ नहीं सका | और जब ये अलग-अलग हो गई तो तुमने सरलता से सब को तोड़ डाला | इसी प्रकार यदि तुम लोग आपस में झगड़ते और अलग रहोगे तो, दूसरे लोग तुम लोगों को तंग करेंगे और दबा लेंगे | लेकिन यदि तुम लोग परस्पर मेल से रहोगे तो तुम से कोई शत्रुता करने का साहस नहीं करेगा |


मातादीन के लड़कों ने उसी दिन से आपस में झगड़ना छोड़ दिया | वे मेल से रहने लगे |”






6. वैद्यजी भगाये गये


देवसहाय का लड़का भगवतीप्रसाद बीमार हो गया था | वह गर्मी की दोपहर में घर से चुपचाप आम चुनने भाग गया और वहां उसे लू लग गयी | उसे जोर से बुख़ार चढ़ा था | देवसहाय ने वैद्य जी को अपने लड़के की चिकित्सा के लिए बुलाया |

वैद्य जी ने आकर लड़के की नाड़ी देखी और कहा – ” इसे लू लगी है | यह बड़ा चंचल जान पड़ता है | दोपहरी में घर से बाहर जाने का क्या काम था | यह बहुत बुरी बात है | जो लड़के अपने बड़ों की बात नहीं मानते | वह ऐसे ही दु:ख भोगते हैं |”

वैद्य जी उपदेश देते जाते थे और लड़कों को डांटते जाते थे | देवसहाय को यह बात अच्छी नहीं लगी | उन्होंने कहा – ” वैद्य जी मैंने आप को बुलाकर भूल कि आप अपनी फीस लीजिए और जाइए | मैं अपने लड़के की चिकित्सा किसी अन्य वैद्य से करा लूंगा | आप तो बीमार लड़के को डांटकर और दु:खी कर रहे हैं |”

वैध जी बेचारे लज्जित होकर चले गए |

कहानी की शिक्षा: ” जो दु:ख में पड़ा है, उससे उस समय उसकी भूले बताकर और उपदेश देकरअधिक दु:खी नहीं करना चाहिए | उस समय तो उससे सहानुभूति दिखाना और उसकी सेवा करना ही उचित है |””






7. बुरे कर्म का बुरा नतीजा


एक गरीब किसान के पास एक छोटा सा खेत और एक बैल था। बड़ी मेहनत से उसने कुछ पैसे जमा किये और एक बैल और खरीदा। जब वो बैल खरीद कर ला रहा था तो रास्ते में उसे चार युवक मिले। उन युवकों ने किसान से कहा क्या तुम इस बैल को बेचोगे। किसान ने सोचा मैंने यह बैल 1500 रुपए में खरीदा है। यदि इससे अधिक पैसे मिलते हैं तो मैं इसे बेच दूंगा और इससे बेहतर बैल खरीद लूंगा।


उस किसान ने उन लड़कों को बैल की कीमत 2000 रुपए बताई। लड़के बोले कीमत तो ज्यादा है क्यों न किसी समझदार व्यक्ति को पंच बनाकर फैसला करा लें। आप और हम यह वचन लेंगे की जो भी कीमत पंच कहेंगे वो हम मान लेंगे। कुछ सोच कर किसान ने बैल बेचने का वचन दे दिया। थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध व्यक्ति गुजरे। सभी न उन्हें ही पंच बनाने का फैसला किया। किसान ने भी सहमति दे दी। वास्तव में वह चारों लड़के एक ठग पिता की संतान थे और वो वृद्ध कोई और नहीं बल्कि उन चरों का पिता ही था। उन्होंने पिता को ही पंच बना लिया।


पिता ने बैल की कीमत मात्र 500 रुपए तय की। वचन में बंधे किसाओं को 500 रूपये में बैल बेचना पड़ा। लेकिन वो इस बात को समझ गया कि मुझे ठगा जा रहा है। अगले दिन किसान एक सुंदर महिला के भेष में उन चारों भाइयों से मिला और उनमे से किसी एक के साथ शादी करने की इच्छा व्यक्त की। चारों तैयार हो गए और एक दूसरे से बहस करने लगे की मैं शादी करूँगा – मैं शादी करूँगा। नारी के भेष में किसान बोला जो मेरे लिए बनारसी साड़ी, मथुरा के पेड़े और सहारनपुर के आम सबसे पहले लाएगा मैं उसी के साथ शादी करूंगी। यह सुन चारों शहर की ओर दौड़े। उनके जाने के बाद किसान ने उस ठग पिता को बहुत पीटा और वहां से चला गया। जब ठक के चारों बेटे वापस आये और अपने पिता को इस स्थिति में देखा तो मन कसौटते रह गए वो कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि किसान का पता तो वह जानते ही नहीं थे।


अगले दिन वह किसान एक वैध का भेष बनाकर उस वृद्ध ठग का इलाज करने पंहुचा। और लड़कों को चार जड़ी बूटी लाने के लिए अलग अलग भेजा। लड़कों के जाने के बाद उस किसान ने उस वृद्ध को फिर पीटा और अपना बैल लेकर चला गया। जब चारों भाई लोटे तो पिता और और बद्तर अवस्ता में पाया। अब उन्होंने प्रण ले लिए की कभी किसी के साथ ठगी नहीं करेंगे। इस तरह एक मामूली किसान ने अपनी समझदारी से ठगों को सुधर दिया।





8. सूरदास


सूरदास भगवान कृष्ण के सबसे बड़े भक्तों में से एक थे। वह कृष्ण से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने उनके सम्मान में एक लाख से अधिक भक्ति गीत लिखे।


कहानी के अनुसार सूरदास एक अंधे व्यक्ति थे, जिन्होंने एक बार राधा का पीछा करते हुए उसकी पायल छीन ली थी।


जब उसे वापस करने के लिए कहा गया, तो उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह उसकी पहचान की पुष्टि नहीं कर सकता क्योंकि वह अंधा था।


इस बिंदु पर, कृष्ण ने उन्हें दृष्टि का आशीर्वाद दिया, जिसके बाद सूरदास ने कृष्ण से उनकी दृष्टि फिर से लेने की भीख मांगी। जब पूछा गया कि क्यों, उन्होंने कहा कि उन्होंने कृष्ण को देखा था, और और कुछ नहीं था जो वह फिर से देखना चाहते थे।


यह कहानी आपके बच्चे को बिना शर्त प्यार करना सिखाएगी और उन चीजों के प्रति समर्पण प्रदर्शित करेगी जो उसकी परवाह करती है।






9. अर्जुन



जब पांडव छोटे थे, तो उन्होंने युद्ध के मास्टर द्रोण के अधीन प्रशिक्षण लिया। द्रोण अपने शिष्यों का परीक्षण करना चाहते थे,


इसलिए उन्होंने एक खिलौना पक्षी को एक पेड़ में चिपका दिया और उन सभी को अपने धनुष को अपनी आंखों पर लगाने के लिए कहा। जब उसने उनसे पूछा कि वे क्या देख सकते हैं,


तो पांडवों ने अलग-अलग उत्तर दिए, जैसे पक्षी, पत्ते, पेड़, इत्यादि, और चूक गए। केवल अर्जुन ने, बिना एक ताल गंवाए, कहा कि वह पक्षी की आंख से ज्यादा कुछ नहीं देख सकता।


प्रसन्न होकर द्रोण ने अर्जुन को तीर मारने के लिए कहा। अर्जुन के बाण ने चिड़िया की आंख में पूरी तरह से छेद कर दिया


यह फोकस और दृढ़ संकल्प के बारे में एक कहानी है, जो आपके बच्चों को दिखाएगा कि वे क्या चाहते हैं और इसके लिए काम करने से उन्हें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।






10. सीता की शक्ति


राम और सीता के अयोध्या लौटने के बाद, उन्हें राजा और रानी का ताज पहनाया गया, और एक समृद्ध शासन शुरू किया।


हालाँकि, सीता के बारे में अफवाहें फैलने लगीं, जो एक अन्य पुरुष रावण के साथ रहती थी (भले ही यह उसकी इच्छा के विरुद्ध था)।


इन अफवाहों को नियंत्रित करने और अपनी प्रजा के निरंतर विश्वास को सुनिश्चित करने के लिए, राम ने सीता को वन में निर्वासित कर दिया, जहाँ वह वाल्मीकि के साथ रहीं। यहाँ, उसने जुड़वाँ लड़कों को जन्म दिया और उन्हें अकेले माँ के रूप में पाला।


यह फोकस और दृढ़ संकल्प के बारे में एक कहानी है, जो आपके बच्चों को दिखाएगा कि वे क्या चाहते हैं और इसके लिए काम करने से उन्हें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।


यह कहानी बताती है कि सुई की विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाएं कैसे मजबूत, बहादुर और स्वतंत्र हो सकती हैं।






11. श्रावण की वफादारी


श्रवण एक गरीब किशोर लड़का था। भारत के सभी धार्मिक स्थलों की तीर्थ यात्रा पर अपने माता-पिता की मदद करना।


जब वे बूढ़े और अंधे थे, वह उन्हें अपने कंधों पर ढँकी दो टोकरियों में ले जा रहा था। अयोध्या के जंगलों को पार करते समय, श्रवण राजकुमार दशरथ द्वारा चलाए गए एक तीर से मारा जाता है,


और मर जाता है। अपनी मरती हुई सांस के साथ भी, वह दशरथ से अपने प्यासे माता-पिता के लिए पानी ले जाने के लिए कहता है।


श्रवण दया और वफादारी का अवतार।


यह कहानी आपके बच्चों को करुणा और माता-पिता की देखभाल करने के गुणों को समझने में मदद करेगी।






12. मंदोदरी का धैर्य



मंदोदरी रावण की पत्नी थी। जब उसने क्रूरता की, तो उसने उसे न्यायपूर्ण और सम्मानजनक होने के लिए मनाने की पूरी कोशिश करते हुए अपना दिन बिताया।


उसने उसे सीता को मुक्त करने के लिए भी कहा, हालांकि उसकी सलाह बहरे कानों पर पड़ी। अंत तक, वह अपने पति के प्रति वफादार रही।


श्रवण दया और वफादारी का अवतार। यह कहानी आपके बच्चों को करुणा और माता-पिता की देखभाल करने के गुणों को समझने में मदद करेगी।


यह पाठ आपके बच्चों को अपने प्रियजनों के साथ धैर्य रखना सिखाता है, भले ही वे गलतियाँ कर रहे हों, बिना उन्हें छोड़े। किसी को प्यार करने का मतलब है उसका समर्थन करना, भले ही उसके कार्यों का समर्थन न क





Short Storie In Hindi

 Short Storie In Hindi


जब कभी भी short stories in hindi कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।




1. मुर्गा की अकल ठिकाने


एक समय की बात है, एक गांव में ढेर सारे मुर्गे रहते थे। गांव के बच्चे ने किसी एक मुर्गे को तंग कर दिया था। मुर्गा परेशान हो गया, उसने सोचा अगले दिन सुबह मैं आवाज नहीं करूंगा। सब सोते रहेंगे तब मेरी अहमियत सबको समझ में आएगी, और मुझे तंग नहीं करेंगे। मुर्गा अगली सुबह कुछ नहीं बोला। सभी लोग समय पर उठ कर अपने-अपने काम में लग गए इस पर मुर्गे को समझ में आ गया कि किसी के बिना कोई काम नहीं रुकता। सबका काम चलता रहता है।


 शिक्षा – घमंड नहीं करना चाहिए आपकी अहमियत लोगो को बिना बताये पता चलता है।




2. रेलगाड़ी


पिंकी बहुत प्यारी लड़की है। पिंकी कक्षा दूसरी में पढ़ती है। एक दिन उसने अपनी किताब में रेलगाड़ी देखी। उसे अपनी रेल – यात्रा याद आ गई, जो कुछ दिन पहले पापा-मम्मी के साथ की थी। पिंकी ने चौक उठाई और फिर क्या था, दीवार पर रेलगाड़ी का इंजन बना दिया। उसमें पहला डब्बा जुड़ गया , दूसरा डब्बा जुड़ गया , जुड़ते – जुड़ते कई सारे डिब्बे जुड़ गए। जब चौक खत्म हो गया पिंकी उठी उसने देखा कक्षा के आधी दीवार पर रेलगाड़ी बन चुकी थी। फिर क्या हुआ – रेलगाड़ी दिल्ली गई , मुंबई गई , अमेरिका गई , नानी के घर गई , और दादाजी के घर भी गई।


 शिक्षा – बच्चों के मनोबल को बढ़ाइए कल के भविष्य का निर्माण आज से होने दे।




3. शरारती चूहा


गोलू के घर में एक शरारती चूहा आ गया। वह बहुत छोटा सा था मगर सारे घर में भागा चलता था। उसने गोलू की किताब भी कुतर डाली थी। कुछ कपड़े भी कुतर दिए थे। गोलू की मम्मी जो खाना बनाती और बिना ढके रख देती , वह चूहा उसे भी चट कर जाता था। चूहा खा – पीकर बड़ा हो गया था। एक दिन गोलू की मम्मी ने एक बोतल में शरबत बनाकर रखा। शरारती चूहे की नज़र बोतल पर पड़ गयी। चूहा कई तरकीब लगाकर थक गया था, उसने शरबत पीना था। चूहा बोतल पर चढ़ा किसी तरह से ढक्कन को खोलने में सफल हो जाता है। अब उसमें चूहा मुंह घुसाने की कोशिश करता है। बोतल का मुंह छोटा था मुंह नहीं घुसता। फिर चूहे को आइडिया आया उसने अपनी पूंछ बोतल में डाली। पूंछ शरबत से गीली हो जाती है उसे चाट-चाट कर चूहे का पेट भर गया। अब वह गोलू के तकिए के नीचे बने अपने बिस्तर पर जा कर आराम से करने लगा।


शिक्षा – मेहनत करने से कोई कार्य असम्भव नहीं होता।





4. रितेश के तीन खरगोश राजा


रितेश का कक्षा तीसरी में पढ़ता था। उसके पास तीन छोटे प्यारे प्यारे खरगोश थे। रितेश अपने खरगोश को बहुत प्यार करता था। वह स्कूल जाने से पहले पाक से हरे-भरे कोमल घास लाकर अपने खरगोश को खिलाता था। और फिर स्कूल जाता था। स्कूल से आकर भी उसके लिए घास लाता था।


एक दिन की बात है रितेश को स्कूल के लिए देरी हो रही थी। वह घास नहीं ला सका, और स्कूल चला गया। जब स्कूल से आया तो खरगोश अपने घर में नहीं था। रितेश ने खूब ढूंढा परंतु कहीं नहीं मिला। सब लोगों से पूछा मगर खरगोश कहीं भी नहीं मिला।


रितेश उदास हो गया रो-रोकर आंखें लाल हो गई। रितेश अब पार्क में बैठ कर रोने लगा। कुछ देर बाद वह देखता है कि उसके तीनों खरगोश घास खा रहे थे , और खेल रहे थे। रितेश को खुशी हुई और वह समझ गया कि इन को भूख लगी थी इसलिए यह पार्क में आए हैं। मुझे भूख लगती है तो मैं मां से खाना मांग लेता हूं। पर इनकी तो मैं भी नहीं है। उसे दुख भी हुआ और खरगोश को मिलने की खुशी हुई।


 शिक्षा – जो दूसरों के दर्द को समझता है उसे दुःख छू भी नहीं पता।





5. दोस्त का महत्व


वेद गर्मी की छुट्टी में अपनी नानी के घर जाता है। वहां वेद को खूब मजा आता है , क्योंकि नानी के आम का बगीचा है। वहां वेद ढेर सारे आम खाता है और खेलता है। उसके पांच दोस्त भी हैं, पर उन्हें बेद आम नहीं खिलाता है। एक दिन की बात है, वेद को खेलते खेलते चोट लग गई। वेद के दोस्तों ने वेद को उठाकर घर पहुंचाया और उसकी मम्मी से उसके चोट लगने की बात बताई, इस पर वेद को मालिश किया गया। मम्मी ने उन दोस्तों को धन्यवाद किया और उन्हें ढेर सारे आम खिलाएं। वेद जब ठीक हुआ तो उसे दोस्त का महत्व समझ में आ गया था। अब वह उनके साथ खेलता और खूब आम खाता था।


शिक्षा – दोस्त सुख-दुःख के साथी होते है। उनसे प्यार करना चाहिए कोई बात छुपाना नहीं चाहिए।





6. मां की ममता


आम के पेड़ पर एक सुरीली नाम की चिड़िया रहती थी। उसने खूब सुंदर घोंसला बनाया हुआ था। जिसमें उसके छोटे-छोटे बच्चे साथ में रहते थे। वह बच्चे अभी उड़ना नहीं जानते थे, इसीलिए सुरीली उन सभी को खाना ला कर खिलाती थी।


एक दिन जब बरसात तेज हो रही थी। तभी सुरीली के बच्चों को जोर से भूख लगने लगी। बच्चे खूब जोर से रोने लगे, इतना जोर की देखते-देखते सभी बच्चे रो रहे थे। सुरीली से अपने बच्चों के रोना अच्छा नहीं लग रहा था। वह उन्हें चुप करा रही थी, किंतु बच्चे भूख से तड़प रहे थे इसलिए वह चुप नहीं हो रहे थे।


सुरीली सोच में पड़ गई , इतनी तेज बारिश में खाना कहां से लाऊंगी। मगर खाना नहीं लाया तो बच्चों का भूख कैसे शांत होगा। काफी देर सोचने के बाद सुरीली ने एक लंबी उड़ान भरी और पंडित जी के घर पहुंच गई।


पंडित जी ने प्रसाद में मिले चावल दाल और फलों को आंगन में रखा हुआ था। चिड़िया ने देखा और बच्चों के लिए अपने मुंह में ढेर सारा चावल रख लिया। और झटपट वहां से उड़ गई।


घोसले में पहुंचकर चिड़िया ने सभी बच्चों को चावल का दाना खिलाया। बच्चों का पेट भर गया, वह सब चुप हो गए और आपस में खेलने लगे।


शिक्षा – संसार में मां की ममता का कोई जोड़ नहीं है अपनी जान विपत्ति में डालकर भी अपने बच्चों के हित में कार्य करती है।




7. रानी की शक्ति


रानी एक चींटी का नाम है जो अपने दल से भटक चुकी है। घर का रास्ता नहीं मिलने के कारण , वह काफी देर से परेशान हो रही थी। रानी के घर वाले एक सीध में जा रहे थे। तभी जोर की हवा चली, सभी बिखर गए। रानी भी अपने परिवार से दूर हो गई। वह अपने घर का रास्ता ढूंढने में परेशान थी। काफी देर भटकने के बाद उसे जोर से भूख और प्यास लगी। रानी जोर से रोती हुई जा रही थी। रास्ते में उसे गोलू के जेब से गिरी हुई टॉफी मिल गई। रानी के भाग्य खुल गए। उसे भूख लग रही थी और खाने को टॉफी मिल गया था। रानी ने जी भर के टोपी खाया अब उसका पेट भर गया। रानी ने सोचा क्यों ना इसे घर ले चलूँ , घर वाले भी खाएंगे। टॉफी बड़ा थी, रानी उठाने की कोशिश करती और गिर जाती। रानी ने हिम्मत नहीं हारी। वह दोनों हाथ और मुंह से टॉफी को मजबूती से पकड़ लेती है । घसीटते -घसीटते वह अपने घर पहुंच गई। उसके मम्मी – पापा और भाई-बहनों ने देखा तो वह भी दौड़कर आ गए। टॉफी उठाकर अपने घर के अंदर ले गए। फिर क्या था ? सभी की पार्टी शुरू हो गई।


शिक्षा – लक्ष्य कितना भी बड़ा हो निरंतर संघर्ष करने से अवश्य प्राप्त होता है।




8. मोती का मित्र


मोती तीसरी कक्षा में पढ़ता है। वह स्कूल जाते समय अपने साथ दो रोटी लेकर जाता था। रास्ते में मंदिर के बाहर एक छोटी सी गाय रहती थी। वह दोनों रोटी उस गाय को खिलाया करता था। मोती कभी भी गाय को रोटी खिलाना नहीं भूलता। कभी-कभी स्कूल के लिए देर होती तब भी वह बिना रोटी खिलाए नहीं जाता । स्कूल में लेट होने के कारण मैडम डांट भी लगाती थी। वह गाय इतनी प्यारी थी, मोती को देखकर बहुत खुश हो जाती । मोती भी उसको अपने हाथों से रोटी खिलाता। दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे। एक दिन की बात है मोती बाजार से सामान लेकर लौट रहा था। मंदिर के बाहर कुछ लड़कों ने उसे पकड़ लिया। मोती से सामान छीनने लगे। गाय ने मोती को संकट में देख उसको बचाने के लिए दौड़ी। गाय को अपनी ओर आता देख सभी लड़के नौ-दो-ग्यारह हो गए। मोती ने गाय को गले लगा लिया, बचाने के लिए धन्यवाद कहा।


शिक्षा– गहरी मित्रता सदैव सुखदाई होती है। निस्वार्थ भाव से व्यक्ति को मित्रता करनी चाहिए। संकट में मित्र ही काम आता है।




9. बलवान कछुए की मूर्खता


एक सरोवर में विशाल नाम का एक कछुआ रहा करता था। उसके पास एक मजबूत कवच था। यह कवच शत्रुओं से बचाता था। कितनी बार उसकी जान कवच के कारण बची थी। एक बार भैंस तालाब पर पानी पीने आई थी। भैंस का पैर विशाल पर पड़ गया था। फिर भी विशाल को नहीं हुआ। उसकी जान कवच से बची थी। उसे काफी खुशी हुई क्योंकि बार-बार उसकी जान बच रही थी। यह कवच विशाल को कुछ दिनों में भारी लगने लगा। उसने सोचा इस कवच से बाहर निकल कर जिंदगी को जीना चाहिए। अब मैं बलवान हो गया हूं , मुझे कवच की जरूरत नहीं है। विशाल ने अगले ही दिन कवच को तालाब में छोड़कर आसपास घूमने लगा। अचानक हिरण का झुंड तालाब में पानी पीने आया। ढेर सारी हिरनिया अपने बच्चों के साथ पानी पीने आई थी। उन हिरणियों के पैरों से विशाल को चोट लगी, वह रोने लगा। आज उसने अपना कवच नहीं पहना था। जिसके कारण काफी चोट जोर से लग रही थी। विशाल रोता-रोता वापस तालाब में गया और कवच को पहन लिया। कम से कम कवच से जान तो बचती है।


शिक्षा – प्रकृति से मिली हुई चीज को सम्मान पूर्वक स्वीकार करना चाहिए वरना जान खतरे में पड़ सकती है।




10. समाज सेवा


ठाकुरदास अपनी पत्नी और इकलौते बच्चे को छोड़ कर इस संसार से चल बसा। पत्नी के कंधे पर, सारे परिवार का दायित्त्व आ गया। इसी प्रकार दिन कटते रहे ,और वर्ष बीतते गए। एक दिन बेटा रात के समय बैठा , माँ के पैर दबा रहा था , और बातें भी कर रहा था -“माँ बड़ा होकर , मैं पढ़ -लिखकर , विद्वान बनूँगा ,और तुम्हार बहुत सेवा करूँगा। ” ” कैसी सेवा करेगा तू मेरी ?” माँ ने पूछा। ” बड़े कष्ट सहन कर तुम मुझे पढ़ा रही हो माँ , में कमाने लगूंगा न जब , तब तुम्हे अच्छा – अच्छा खाना खिलाऊंगा , और हाँ तुम्हारे लिए गहने भी लाऊंगा। ” ” हाँ बेटा ,तू अवश्य सेवा करेगा मेरी। ‘ माँ बोली ” पर गहने मेरी पसंद के ही बनवाना। ” ” कौन से गहने माँ “? ” बेटा ,सुन मुझे तीन गहनों की चाह है। मैं चाहती हु – गांव में अच्छा विद्यालय हो ,चिकित्सालय हो, और निर्धन – असहाय बालकों को खाने -पिने तथा पहनने की सुविधा हो। ”




11. चुनमुन के बच्चे


बच्चों की प्यारी गोरैया चिड़िया। यह सबके घर में प्यार से रहती है। जो दाना-पानी देता है, उसके घर तो मस्ती से रहती है। कूलर के पीछे चुनमुन का घोंसला है। उसके तीन बच्चे है , यह अभी उड़ना नहीं जानते। चुनमुन के बच्चों ने उड़ना सिखाने के लिए तंग कर दिया। चुनमुन कहती अभी थोड़ी और बड़ी हो जाओ तब सिखाएंगे। बच्चे दिनभर ची ची ची ची करके चुनमुन को परेशान करते। एक दिन चुनमुन ने बच्चों को उड़ना सिखाने के लिए कहा। अपने दोनों हाथों में उठाकर आसमान में ले गई। उन्हें छोड़ दिया, वह धीरे-धीरे उड़ रही थी। जब बच्चे गिरने लगते चुनमुन उन्हें अपने पीठ पर बैठा लेती। फिर उड़ने के लिए कहती। ऐसा करते करते चुनमुन के बच्चे आसमान में उड़ने लगे थे। चुनमुन ने सभी को घर चलने के लिए कहा। सब मां के पीछे-पीछे घर लौट आए।


शिक्षा – अभ्यास किसी भी कार्य की सफलता की पहली सीढ़ी होती है।





12. कालिया को मिली सजा


कालिया से पूरा गली परेशान था। गली से निकलने वाले लोगों को कभी भों भों करके डराता। कभी काटने दौड़ता था। डर से बच्चों ने उस गली में अकेले जाना छोड़ दिया था। कोई बच्चा गलती से उस गली में निकल जाता तो , उसके हाथों से खाने की चीज छीन कर भाग जाता । कालिया ने अपने दोस्तों को भी परेशान किया हुआ था। सब को डरा कर वाह अपने को गली का सेट समझने लगा था। उसके झुंड में एक छोटा सा शेरू नाम का डॉगी भी था। वह किसी को परेशान नहीं करता, छोटे बच्चे भी उसे खूब प्यार करते थे। एक दिन शेरू को राहुल ने एक रोटी ला कर दिया। शेरू बहुत खुश हुआ उस रोटी को लेकर गाड़ी के नीचे भाग गया। वहीं बैठ कर खाने लगा। कालिया ने शेरू को रोटी खाता हुआ देख जोर से झटका और रोटी लेकर भाग गया। शेरू जोर-जोर से रोने लगा। राहुल ने अपने पापा से बताया। उसके पापा कालिया की हरकत को जानते थे। वह पहले भी देख चुके थे। उन्हें काफी गुस्सा आया। एक लाठी निकाली और कालिया की मरम्मत कर दी। कालिया को अब अपनी नानी याद आ गई थी। वह इतना सुधर गया था , गली में निकलने वालों को परेशान भी नहीं करता। छोटे बच्चे को देखते ही छुप जाता था।


शिक्षा – बुरे काम का बुरा ही नतीजा होता है बुरे कामों से बचना चाहिए।





13. महात्मा बना विषधर


गांव के बाहर पीपल बड़ा वृक्ष था। यह वृक्ष 200 साल से अधिक पुराना था। गांव के लोग उस वृक्ष के नीचे नहीं जाते थे। वहां एक भयंकर विषधर सांप रहा करता था। कई बार उसने चारा खा रही बकरियों को काट लिया था। गांव के लोगों में उसका डर था। गांव में रामकृष्ण परमहंस आए हुए थे। लोगों ने उस विषधर का इलाज करने को कहा। रामकृष्ण परमहंस उस वृक्ष के नीचे गए और विषधर को बुलाया। विषधर क्रोध में परमहंस जी के सामने आंख खड़ा हुआ। विषधर को जीवन का ज्ञान देकर परमहंस वहां से चले गए। विषधर अब शांत स्वभाव का हो गया। वह किसी को काटना नहीं था। गांव के लोग भी बिना डरे उस वृक्ष के नीचे जाने लगे। एक दिन जब रामकृष्ण परमहंस गांव लौट कर आए। उन्होंने देखा बच्चे पीपल के पेड़ के नीचे खेल रहे हैं। वह विषधर को परेशान कर रहे थे। विषधर कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा करता देख उन्होंने बच्चों को डांट कर भगाया , और विषधर को अपने साथ ले गए।


शिक्षा – संत की संगति में दुर्जन 





14. चिंटू पिंटू की शरार


चिंटू-पिंटू दोनों भाई थे, दोनों की उम्र लगभग 2 साल की होगी। दोनों खूब शरारत करते थे। चिंटू ज्यादा शरारती था। वह पिंटू के सूंढ़ को अपने सूंढ़ में लपेटकर खींचता और कभी धक्का देकर गिरा देता। एक दिन की बात है, दोनों खेल में लड़ते-झगड़ते दौड़ रहे थे। चिंटू का पैर फिसल जाता है, वह एक गड्ढे में गिर जाता है। चिंटू काफी मशक्कत करता है फिर भी वह बाहर नहीं निकल पाता। पिंटू उसे अपने सूंढ़ से ऊपर खींचने की कोशिश करता। मगर उसकी कोशिश नाकाम रहती। पिंटू दौड़कर अपनी मां को बुला लाता है। उसकी मां अपने लंबे से सूंढ़ में लपेट कर चिंटू को जमीन पर ले आती है। चिंटू की शरारत उस पर आज भारी पड़ गई थी। उसने रोते हुए कहा-आगे से शरारत नहीं करूंगा। दोनों भाई खेलने लगे, इसको देकर उसकी मां बहुत खुश हुई।


शिक्षा – अधिक शरारत और दूसरों को तंग करने की आदत सदैव आफत बन जाती है।





15. स्वयं का नुकसान


शहर में एक छोटी सी दुकान , जिसमें कुछ चिप्स , पापड़ , टॉफी , बिस्किट आदि की बिक्री होती थी। यह दुकान अब्दुल मियां की थी। इनकी हालात सभी लोगों को मालूम थी , इसलिए ना चाहते हुए भी आस पड़ोस के लोग कुछ ऐसा सामान ले लिया करते थे। जिससे अब्दुल मियां की कुछ कमाई हो जाए। दुकान में चूहों ने भी अपना डेरा जमा लिया था। दुकान में एक से बढ़कर एक शरारती चूहे आ गए थे। इन चूहों ने टॉफी और बिस्किट को नुकसान पहुंचाना चालू कर दिया था। अब्दुल काफी परेशान हो गया था , उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस शरारत से कैसे बचे। एक दिन की बात है, अब्दुल बैठा हुआ था तीन – चार चूहे आपस में लड़ रहे थे। अब्दुल को गुस्सा आया उसने एक डंडा उन चूहों की ओर जोर से चलाया। चूहे उछल कर भाग गए, किंतु वह डंडा इतना तेज चलाया गया था कि टॉफी रखने वाली शीशे की जार टूट गई। ऐसा करने से और भी बड़ा नुकसान हो गया।


शिक्षा – क्रोध में किसी प्रकार का कार्य नहीं करना चाहिए , यह स्वयं के लिए नुकसानदेह होता है।





16. अपने गलती का पछतावा


गोपाल के घर पांच भैंस और एक गाय थी। वह सभी भैंसों की दिनभर देखभाल किया करता था। उनके लिए दूर-दूर से हरी – हरी घास काटकर लाया करता और उनको खिलाता। गाय , भैंस गोपाल की सेवा से खुश थी। सुबह – शाम इतना दूध हो जाता , गोपाल का परिवार उस दूध को बेचने पर विवश हो जाता। पूरे गांव में गोपाल के घर से दूध बिकने लगा। अब गोपाल को काम करने में और भी मजा आ रहा था , क्योंकि इससे उसकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही थी। कुछ दिनों से गोपाल परेशान होने लगा , क्योंकि उसके रसोईघर में एक बड़ी सी बिल्ली ने आंखें जमा ली थी। गोपाल जब भी दूध को रसोई घर में रखकर निश्चिंत होता। बिल्ली दूध पी जाती और उन्हें जूठा भी कर जाती। गोपाल ने कई बार उस बिल्ली को भगाया और मारने के लिए दौड़ाया , किंतु बिल्ली झटपट दीवार चढ़ जाती और भाग जाती। एक दिन गोपाल ने परेशान होकर बिल्ली को सबक सिखाने की सोंची । जूट की बोरी का जाल बिछाया गया , जिसमें बिल्ली आसानी से फंस गई। अब क्या था गोपाल ने पहले डंडे से उसकी पिटाई करने की सोची। बिल्ली इतना जोर – जोर से झपट रही थी गोपाल उसके नजदीक नहीं जा सका। किंतु आज सबक सिखाना था , गोपाल ने एक माचिस की तीली जलाई और उस बोरे पर फेंक दिया। देखते ही देखते बोरा धू-धू कर जलने लगा , बिल्ली अब पूरी शक्ति लगाकर भागने लगी। बिल्ली जिधर जिधर भागती , वह आग लगा बोरा उसके पीछे पीछे होता। देखते ही देखते बिल्ली पूरा गांव दौड़ गई। पूरे गांव से आग लगी……………….. आग लगी , बुझाओ …….बुझाओ इस प्रकार की आवाज उठने लगी। बिल्ली ने पूरा गांव जला दिया। गोपाल का घर भी नहीं बच पाया था।


शिक्षा- आवेग और स्वयं की गलती का फल खुद को तो भोगना पड़ता ही है , साथ में दूसरे लोग भी उसकी सजा भुगतते हैं।




17. दद्दू की चोट पर हुई किसकी पिटाई


दद्दू और मोहित दोनों भाई थे। दोनों एक ही विद्यालय में पढ़ते थे , मोहित दद्दू से 2 साल बड़ा था। दोनों एक साथ स्कूल जाते , लौटते समय भी दोनों साथ ही आते थे। एक दिन की बात है दद्दू अपने दोस्तों के साथ साथ , तेज कदमों से घर की ओर लौट रहा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर पर पड़ा , कंधे पर किताब – कॉपी का बोझ लदा था , वह संभल नहीं पाया और गिर गया। दद्दू को चोट लग गई , उसका घुटना छिल गया…………. जिससे दद्दू जोर जोर से रोने लगा। पीछे मोहित आ रहा था दौड़ कर झट से अपने भाई को उठा लिया। मोहित समझदार था दद्दू को काफी समझाया किंतु वह चुप नहीं हो रहा था। मोहित ने झटपट एक उपाय सोचा और सड़क पर 4-5 लात जोर से मारी और दद्दू को कहा लो इसने तुम्हें चोट लगाया था मैंने इसे चोट लगा दिया। दद्दू अब सोच में पड़ गया , उसने भी 8 -10 लात मारी। उसके और दोस्त थे , वह भी सड़क पर उछलने लगे जिससे सड़क को और चोट लगे। बस क्या था , अब यह मनोरंजन का साधन बन गया। कुछ देर बाद सभी वहां से जा चुके थे। घर पहुंच कर मोहित ने दद्दू के चोट को दिखाया और डिटॉल तथा साफ पानी से घाव को साफ किया गया।


शिक्षा – समय पर लिया गया निर्णय सर्वदा ठीक होता है।




18. कुम्हार का वात्सल्य रूप


आज लकड़ी काटने के लिए मदन घूमता रहा, किंतु उसे कोई सूखा पेड़ नहीं मिला। वह प्रकृति से इतना जुड़ा हुआ था कि वह हरे-भरे वृक्षों को अपने कुल्हाड़ी के चोट से नहीं काटता। पेड़-पौधों को वह बेटे के समान मानता था और बेटे की हत्या मानव कभी कर ही नहीं सकता। मदन बेहद गरीब था, घर में बुजुर्ग मां-बाप, पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे थे। उनका भरण-पोषण मदन के कार्य से ही चलता था। मदन दिनभर जंगलों में घूमता लकड़ियां जमा करता और शाम तक बाजार में बेचकर खाने-पीने का सामान घर ले आता। इसी से पूरा घर दो वक्त की रोटी खा पाता था। न जाने आज कैसा दिन था कि आज उसे कोई सुखी लकड़ी या सुखा पेड़ मिल ही नहीं रहा था। वह थक हार कर एक जगह बैठ गया वह आज बेहद दुखी था कि आज उसे घर ले जाने के लिए अन्य पानी का प्रबंध नहीं हो सका। वह सोचते सोचते बेसुध हो गया और वहीं लेट गया। प्रकृति सदैव मानव की रक्षा करती है, मानव के जीवन का एक अभिन्न अंग होती है और मनुष्य को प्रकृति पुत्र के समान पालन करती है। मदन की ऐसी हालत देख प्रकृति में भी उदासी का भाव था। तभी अचानक एक अनोखी घटना घटती है, पेड़ों से शीतल हवा बहने लगती है। मदन कि अचानक नींद खुलती है तो वह अपने नजदीक एक कपड़े की पोटली पाता है। यह पोटली पेड़ों से चलने वाली हवाओं के साथ मदन के पास आया था। इस पोटली का रहस्य यह था – कुछ दिन पूर्व एक भले आदमी को लूट कर जंगली डाकू भाग रहे थे, तभी अचानक उनका पैर फिसला और वह पहाड़ों की दुर्गम खाई में जा गिरे जिससे उनकी मृत्यु हो गई। यह पोटली गिरते समय डाकुओं के हाथ से छिटक कर पेड़ पर टंग गई थी। आज आवश्यकता की घड़ी में मदन को उन पैसों से सहायता हो सकी।


शिक्षा – जब आप किसी की सहायता करते हैं निर्दोष लोगों को परेशान नहीं करते तो प्रकृति भी आपकी सहायता करती है। जब आप प्रकृति का नुकसान पहुंचाते हैं तो प्रकृति भी आप को नुकसान पहुंचाती है, यह नुकसान दीर्घकालिक होता है।






19. बड़े भैया का रुमाल


राजू तीसरी कक्षा में पढ़ता है , उसका बड़ा भाई कार्तिक भी उसी विद्यालय में पांचवी कक्षा में पढ़ता है। दोनों भाई एक साथ विद्यालय जाते-आते थे। रास्ते में दोनों खूब मस्तियां किया करते थे। कार्तिक के पास एक रुमाल था , जिसे वह हमेशा डिटॉल से धोकर साफ-सुथरा रखता था। राजू अपने भैया को हमेशा देखता वह अपने पास सोचता भैया रूमाल को रखते है? थोड़ी सी भी गंदगी होने पर उसे साफ करते और फिर उसे मोड़ कर अपनी जेब में रख लेते। रुमाल की गंदगी उन्हें पसंद नहीं थी। राजू को इन सब बातों की समझ नहीं थी , वह सोचता रहता था कि बड़े भैया ऐसा क्यों करते हैं , लेकिन कभी उसके समझ में नहीं आया। एक दिन की बात है राजू झूला झूल रहा था तभी उसके हाथ से झूला छूट गया और वह जमीन पर गिर गया। जमीन पर गिरते ही राजू के घुटने में चोट आ गई जिसके कारण उसके घुटने से खून बहने लगा। कार्तिक ने अपने भाई को देखा तो वह जल्दी से दौड़ता हुआ आया और अपने जेब से रुमाल निकाल कर घाव पर बांध दिया। जिसके कारण खून बहना बंद हो गया। कार्तिक तुरंत अपने भाई को हॉस्पिटल ले गया जहां डॉक्टर ने मरहम-पट्टी कर राजू को बढ़िया कर दिया। राजू ने देखा भैया जिस रुमाल को बड़े प्यार से साफ-सुथरा करके अपने पास हमेशा रखते थे। जिससे खूब प्यार करते थे , वह अब गंदी हो चुकी थी। बड़े भाई के प्यार के सामने वह रुमाल अधिक प्यारा नहीं था।






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