Thursday, 8 June 2023

Moral Short Storie In Hindi 2023

 Moral Short Storie In Hindi 2023


जब कभी भी moral short storie in hindi 2023 कहानियों का जिक्र होता है तब बच्चो का भी जिक्र जरुर से किया जाता है, क्यूंकि कहानियाँ मुख्य रूप से बच्चों को ही सबसे ज्यादा पसदं होती है। आज हम दादा-दादी या नाना नानी द्वारा सुनाई जाने वाली ऐसी ही कुछ मज़ेदार Very Short Story In Hindi लेकर आये है, जिससे पढ़ने के बाद आपके बच्चों का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि उन्हें बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।




कुम्हार और सुराही


एक सुराही थी, वह बहुत ही सुंदर थी, उस पर सुंदर - सूंदर बेल, बूटे, फूल और चित्रकारी बनी हुई थी।


भीमा कुम्हार सुराही को बार-बार देखता और खुश हो मन ही मन सोचता कि मेरी मेहनत से ही सुराही इतनी सुंदर बनी है।


भीमा कुम्हार बहुत थका हुआ था, सोचते - सोचते उसे नींद आ गयी और वह वही सो गया। नींद लगते ही वह सपना देखने लगा।


उसने सपने में देखा कि सुराही के पास रखी मिट्टी हिली और कहने लगी- "सुराही ओ सुराही, मैने तुम्हें बनाया सूंदर रूप तुम्हारा मुझसे ही हैं आया"


मिट्टी की आवाज सुन पास में रखे बाल्टी का पानी छलका और बोला- "सुराही ओ सुराही, मैने तुम्हें बनाया सूंदर रूप तुम्हारा मुझसे ही हैं आया"


मिट्टी और पानी की बात सुनकर चाक भी चुप नहीं रह पाया, उसने बोला - तुम दोनों थे कीचड़ मिट्टी इस सचाई को जान लो बनी सुराही मेरे कारण इस बात को तुम मान लो।


पानी मिट्टी और चाक की बात सुनकर बुझती आग भी कहने लगी- तुमसब बातें कच्ची करते, कच्चा है काम तुम्हारा तपकर मुझमे बनी सुराही असली काम हमारा।


भीमा कुम्हार ने सपने में सबकी बातें सुनी और बोला - सब चुप हो जाओ, चलो सुराही से ही पूछते है कि उसे बनाने में किसका सहयोग ज्यादा हैं।


सुराही ने जब यह सवाल सुना तो वह बोली- किसी एक का काम नही ये सबकी मेहनत सबका काम, मिलजुल कर कर सकते है अच्छे - अच्छे सूंदर काम..!!


सुराही ने समझाया कि मुझे बनाने में कुम्हार, मिट्टी, पानी चाक सबका बराबर सहयोग हैं। सुराही की बात सबको समझ आ गयी और वे आपस में मिलजुल कर रहने लगे।






शेर और चार मित्र


एक समय की बात हैं। किसी गाँव में चार दोस्त रहते थे। उनमें से तीन बहुत ही पढ़े- लिखे विद्वान थे, जबकि चौथा दोस्त मूर्ख था। चारों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। वे हमेशा एक साथ रहते और बातें खूब करते थे।


एक दिन की बात हैं। वे एक पेड़ के नीचे बैठे बातें कर रहे थे कि अब हमें कुछ काम करने के लिये पास के नगर में जाना चाहिये। चारों इस बात से राजी हो गये, अगले दिन वे अपना सामान लेकर नगर की तरफ निकल गये।


रास्ता में सुनसान जंगल पड़ता था। वे पेड़ - पौधें जीव - जंतुओं के बारे में बातें करते जा रहे थे।


रास्ते में उन्हें किसी जानवर के हड्डियों का ढाँचा मिला, वह बिखरा हुआ था।


पहला दोस्त बोला- मै हड्डियों के जोड़ने की जादुई विद्या समझता हूँ। देखो में अभी इन्हें जोड़ देता हूँ।


उसने अपने जादुई विद्या से तुरंत उस बिखरे हड्डियों को आपस में जोड़ दिया।


दूसरा दोस्त बोला- मै हड्डियों में माँस, चमड़े, नाखून यह सब लगाने की जादुई विद्या जनता हूँ।


उसने अपनी जादुई विद्या से तुरंत उस कंकाल में मांस, चमड़े, नाखून और बाल आदि लगा दिए।


वह एक शेर का कंकाल था। उसके जादू से वह कंकाल अब मरे हुये शेर में परिवर्तित हो गया।


तीसरा दोस्त बोला- मै मरे हुये जानवरों को जिंदा करने की जादुई विद्या जनता हूँ। देखो में अभी इसे जिंदा कर देता हूँ।


यह सुनकर चौथा दोस्त बोला- रुको दोस्त, यह शेर जिंदा होते ही हमें खा जायेगा इसलिये तुम इसे जिंदा मत करो।


लेकिन तीसरे दोस्त ने- चौथे दोस्त की बातों पर ध्यान नहीं दिया और उसने उस शेर को जिंदा करने का जादू लगाना शुरू कर दिया| यह देख चौथा दोस्त भाग कर पेड़ पर चढ़ गया, तीनों दोस्त शेर के जिंदा होने का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर में वह शेर जिंदा हो गया और जोर - जोर से दहाड़ने लगा, उसे देख तीनों दोस्त भागने लगे, लेकिन शेर ने एक ही छलाँग में उन्हें मार डाला।


शिक्षा:- हमें हमेशा सोच - समझ कर ही कोई फैसला करना चाहिये।





साधू की झोपड़ी


एक गाँव के पास दो साधू अपनी अपनी झोपड़ियाँ बना कर रहते थे। दिन के वक्त वह दोनों गाँव जा कर भिक्षा मांगते और उसके बाद पूरा दिन पूजा-पाठ करते थे।


एक दिन भारी तूफान और आँधी आने के कारण उनकी झोपड़ियाँ जगह-जगह से टूट-फूट गयीं और बहुत हद तक बर्बाद हो गयीं।


पहला साधू यह सब देख कर दुखी हो गया|


पहला साधू बोला- हे ईश्वर ! तूने मेरे साथ यह अनर्थ क्यों किया। क्या मेरी भक्ति, तप, जप और पूजा का यही पुरस्कार है?


इस तरह वह पूरा दिन बड़बड़ाते हुए, अपना जी जलाते हुए वहीं एक पेड़ के नीचे बैठ गया।


तभी वहाँ दूसरा साधू आ पहुंचा-उसने अपनी बर्बाद जोपड़ी देखी तो वह मुस्कुराने लगा और उसी वक्त ऊपरवाले का धन्यवाद करने लगा।


दूसरे साधु ने कहा कि-ऐसे भीषण तूफान में तो पक्के मकान भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं पर तूने तो मेरी आधी झोपड़ी बचा ली।


आज यह बात सिद्ध हो गयी की तू मेरी भक्ति से कितना प्रसन्न है और तेरी मुझ पर कितनी बड़ी कृपा है।


शिक्षा:- हर अच्छी बुरी घटना के दो पहलू होते हैं। बुरा निष्कर्ष निकालना या फिर अच्छा अर्थ निकालना यह दोनों ही आपके हाथ में है।





घास, बकरी और भेड़िया


एक बार की बात है एक मल्लाह के पास घास का ढेर, एक बकरी और एक भेड़िया होता है। उसे इन तीनो को नदी के उस पार लेकर जाना होता है।


पर नाव छोटी होने के कारण वह एक बार में किसी एक चीज को ही अपने साथ ले जा सकता है।


अब अगर वह अपने साथ भेड़िया को ले जाता तो बकरी घास खा जाती।


अगर वह घास को ले जाता तो भेड़िया बकरी खा जाता।


इस तरह वह परेशान हो उठा कि करें तो क्या करें?


उसने कुछ देर सोचा और फिर उसके दिमाग में एक योजना आई।


सबसे पहले वह बकरी को ले कर उस पार गया और वहाँ बकरी को छोड़ कर, वापस इस पार अकेला लौट आया।


उसके बाद वह दूसरे सफर में भेड़िया को उस पार ले गया। और वहाँ खड़ी बकरी को अपने साथ वापस इस पार ले आया।


इस बार उसने बकरी को वहीँ बाँध दिया और घास का ढेर लेकर उस पार चला गया और भेड़िया के पास उस ढेर को छोड़ कर अकेला इस पार लौट आया।


फिर अंतिम सफर में बकरी को अपने साथ ले कर उस पार चला गया।


शिक्षा:-मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खोजने पर समाधान मिल ही जाता है।





सात बहनें और गणेश जी


एक बार की बात है। सात बहनें थी। छः बहनें पूजा-पाठ करती थीं लेकिन सातवीं बहन नहीं।


एक बार गणेशजी ने सोचा मैं इन सात बहनों की परीक्षा करता हूँ। वे साधु के रूप में आए और दरवाजा खटखटाया।


पहली बहन से गणेशजी ने कहा- मेरे लिए खीर बना दो, मैं बड़ी दूर से आया हूँ। उसने मना कर दिया। ऐसे छः बहनों ने मना कर दिया।


लेकिन सातवीं बहन ने हाँ कह दी- उसने चावल बीनना शुरू किए और फिर खीर बनाना शुरू की।


अधपकी खीर उसने चख भी ली फिर साधु महाराज को खीर दी।


साधु ने कहा- तुम भी खीर खा लो।


सातवीं बहन ने कहा- मैंने तो खीर बनाते-बनाते ही खा ली है।


यह सुनते ही गणेशजी साधु से अपने पहले वाले रूप में आ गए


गणेशजी ने सातवीं बहन से कहा- मैं तुम्हें स्वर्ग ले जाऊँगा।


बहन ने कहा कि मैं अकेले स्वर्ग नहीं जाऊँगी। मेरी छः बहनों को भी ले चलिए।


गणेशजी खुश हुए और सबको स्वर्ग ले गए।


स्वर्ग में मजे से घूमने के बाद सभी बहने अपने घर वापिस आ गए और सभी खुश होकर एक साथ रहने लगे।






बच्चे और गुब्बारे वाला


एक बार एक गांव में मेला हो रहा था। मेले में बहुत सारे लोग अपने परिवार के साथ घूमने आए थे।


मेले में बहुत सारे मिठाईयों की दुकान, खिलौने, और गुब्बारे बेचने वाले भी थे। एक कोने में एक गुब्बारे वाला अपने साइकिल पर गुब्बारे बेच रहा था।


तभी उसके पास एक छोटा सा बच्चा आया और उससे पूछने लगा – गुब्बारे वाले यह जो लाल वाला गुब्बारा है क्या यह ऊपर उड़ेगा?


तभी उस गुब्बारे वाले ने उत्तर दिया – हां यह लाल वाला गुब्बारा ऊपर उठेगा।


उसी समय उस बच्चे ने दोबारा गुब्बारे वाले से प्रश्न किया – क्या यह नीला वाला गुब्बारा ऊपर उड़ेगा?


गुब्बारे वाले ने दोबारा उत्तर दिया – हां बच्चे यह गुब्बारा ऊपर उड़ेगा। उस बच्चे ने तीसरी बार फिर से प्रश्न किया – गुब्बारे वाले क्या यह हरा वाला गुब्बारा ऊपर हवा में उड़ेगा?


यह सुनकर उस गुब्बारे वाले ने हंसते हुए उस बच्चे को जवाब दिया – हां बच्चे यह सभी गुब्बारे हवा में उड़ेंगे।


बेटा, गुब्बारा हवा में जाएगा या नहीं यह उसके रंग और आकार पर निर्भर नहीं होता है बल्कि वह तो उसके अंदर में भरे हुए हवा या गैस पर निर्भर करता है।


शिक्षा:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जिस प्रकार गुब्बारे के बाहर के रंग और आकार पर गुब्बारे का ऊपर उड़ना निर्भर नहीं होता उसी प्रकार हमारा भी ऊपर उठना या सफलता प्राप्त करना हमारे बाहरी रंग रूप, हमारे व्यक्तिमत्व पर, हमारी क्षमताओं पर, हमारी योग्यताओं पर निर्भर नहीं होता यह सब तो केवल गुब्बारे रंग है। हमारा ऊपर उठना या हमारी सफलता को छूना हमारे मनोभाव, धारणाओं, हमारी मनोदृष्टि पर निर्भर करते है।





मुन्ना हाथी


मुन्ना हाथी का कारोबार सारे जंगल में फैला था। सारे पेड़-पौधों पर उसका एकछत्र अधिकार था। जहां भी उसकी तबीयत होती वहां जाकर पेड़ों की डालें तोड़ता, पत्ते चबाता और पेड़ हिला डालता।


किसकी मजाल कि उसे रोके। जंगल में शेर ही उसकी बराबरी का जानवर था किंतु उसे पेड़-पौधों से क्या लेना-देना? उसे जानवरों के मांस से मतलब था।


मुन्ना खूब पत्ते खाता, घूमता और मौज करता। एक दिन जंगल के रास्ते से कारों का काफिला निकला। रंग-बिरंगी कारें देखकर मुन्ना का भी मूड हो गया कि वह भी कार में घूमे, हॉर्न बजाकर लोगों को सड़क से दूर हटाए और सर्र से कट मारकर आगे निकल जाए।


दौड़कर वह टिल्लुमल के शोरूम में जा पहुंचा और टिल्लुमल से अच्छी-सी कार दिखाने को कहा। टिल्लु चकरा गया। अब हाथी के लायक कार कहां से लाए।


टिल्लुमल बोला हाथी से- 'भैया तुम्हारे लायक कार कहां मिलेगी? इतनी बड़ी कार तो कोई कंपनी नहीं बनाती।'


परंतु मुन्नाभाई ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली कि कार लेकर ही जाएंगे।


टिल्लुमल ने समझाना चाहा- 'अरे भाई, तुम्हारे लायक कार कंपनी को अलग से आदेश देकर बनवाना पड़ेगा"।


मुन्ना हाथी झल्लाकर बोला- 'तो बनवाओ, इसमें क्या परेशानी है?'


मुन्ना हाथी चीखा-'बहुत बड़ी कार बनेगी तो बनने दो, तुम्हें क्या कष्ट है।


टिल्लुमल बोला- 'जब कार चलेगी तो जंगल के बहुत से पेड़ काटने पड़ेंगे।'


मुन्ना हाथी बोला- 'क्यों... क्यों... काटना पड़ें ?


टिल्लु ने समझाना चाहा- 'कार इतनी बड़ी होगी तो पेड़ तो काटना ही पड़ेंगे मुन्ना भैया', 'क्या पेड़ काटना ठीक होगा अपने जरा से शौक के लिए?'


'अरे टिल्लुमलजी, कार के लिए पेड़ काटना! अपनी मौज-मस्ती के लिए जंगल काटे, यह मुझे स्वीकार नहीं है। जंगल ही तो जीवन है, ऐसा कहकर वह जंगल वापस चला गया।





चतुर किसान


एक बार एक किसान एक बकरी, घास का एक गट्ठर और एक शेर को लिए नदी के किनारे खड़ा था।


उसे नाव से नदी पार करनी थी लेकिन नाव बहुत छोटी थी वह सारे सामान समेत एक बार में पार नहीं कर सकता था।


किसान ने कुछ तरकीब सोची। वह अगर शेर को पहले ले जाकर नदी पार छोड़ आता है तो इधर बकरी घास खा जाएगी और अगर घास को पहले नदी पार ले जाता है तो शेर बकरी खा जाएगा।


अंत में उसे एक समाधान सूझ गया। उसने पहले बकरी को साथ में लिया और नाव में बैठकर नदी के पार छोड़ आया।


इसके बाद दूसरे चक्कर में उसने शेर को नदी पार छोड़ दिया लेकिन लौटते समय बकरी को फिर से साथ ले आया।


इस बार वह बकरी को इसी तरफ छोड़कर घास के गट्ठर को दूसरी और शेर के पास छोड़ आया।


इसके बाद वह फिर से नाव लेकर आया और बकरी को भी ले गया।


इस प्रकार उसने नदी पार कर ली और उसे कोई हानि भी नहीं हुई।






भाग्य अपना अपना


एक किसान था। उसके पास एक बकरा और दो बैल थे। बैलों से वह खेत जोतने का काम लेता। दोनों बैल दिन भर कड़ी मेहनत करके खेतों की जुताई करते थे।


इसके उल्टे बकरे के लिए कोई काम तो था नहीं। वह दिन भर इधर-उधर घूमकर हरी-हरी घास चरता रहता। खा पीकर वह काफी मोटा तगड़ा हो गया था।


यह देखकर बैल सोचते कि इस बकरे के मजे हैं। कुछ करता-धरता तो है नहीं और सारा दिन इधर-उधर घूमकर खाता रहता है।


इधर, बकरा बैलों की हालत देखता तो उसे भी बड़ा दुख होता कि बेचारे सारा दिन हल में जुते रहते हैं और मालिक है कि इनकी ओर पूरी तरह ध्यान नहीं देता। वह बैलों को कुछ सलाह देना चाहता था, जिससे इनका कुछ भला हो।


एक दिन दोनों बैल खेत जोत रहे थे। बकरा भी वहीं खेतों के पास घास चर रहा था। दोनों बैलों को खेत जोतने में काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। वे दोनों हांफ रहे थे।


यह देखकर बकरा मूर्खतापूर्ण स्वर में बोला- ”भाइयो, तुम दोनों को दिन भर खेतों में कड़ी मेहनत करते देखकर मुझे बहुत दुख होता है। परंतु किया क्या जा सकता है, यह तो भाग्य का खेल है। मुझे देखो, मेरे पास दिन भर चरने के अलावा कोई काम नहीं है।


दिन भर मैं इधर-उधर मैदानों में चरता रहता हूं। किसान की पत्नी खुद खेतों में जाती है और मेरे लिए हरी पत्तियां और घास लेकर आती है। तुम दोनों तो मुझसे ईर्ष्या करते होगे।“


दोनों बैल चुपचाप बकरे की बातें सुनते रहे। जब वे शाम को खेतों से काम करके वापस आए तो उन्होंने देखा कि किसान की पत्नी किसी कसाई से धन लेकर उसे वह बकरा बेच रही थी।


दोनों बैलों- की आंखों में आंसू भर आए। बेचारे कर भी क्या सकते थे।


उनमें से एक धीमे स्वर में बोला- ‘आह! तुम्हारे भाग्य में यही लिखा था।’


शिक्षा:- जिसके भाग्य में जैसा लिखा होता है, वैसा ही होता है।





बातूनी कछुआ


एक बार एक समय पर कंबुग्रीव नामक कछुआ एक झील के पास रहता था। दो सारस पक्षी जो उसके दोस्त थे उसके साथ झील में रहते थे। एक बार गर्मियों में, झील सूखने लगी, और उसमें जानवरों के लिए थोड़ा सा पानी बचा था।


सारस ने कछुए को बताया कि दूसरे वन में एक दूसरी झील है जहाँ बहुत पानी है, उन्हें जीवित रहने के लिए वहां जाना चाहिए।


वे योजना के अनुसार कछुए के साथ वहां जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक छड़ी को लिया और कछुए को बिच में मुँह से पकड़कर रखने को कहा और कहा कि अपने मुंह को खोलना नहीं,चाहे कोई भी बात हो। कछुआ उनकी बात मान गया।


कछुए ने छड़ी के बिच को अपने दांतों से पकड़ा और दोनों सरसों ने छड़ी के दोनों कोने को अपने चोंच से पकड़ लिया।


रास्ते में गांवों के लोग कछुए को उड़ते हुए देख रहे थे और बहुत आश्चर्यचकित थे। उन दो पक्षियों के बारे में जमीन पर एक हंगामा सा मच गया था जो एक छड़ी की मदद से कछुए को ले जा रहे थे। सरसों की चेतावनी के बावजूद,


कछुआ ने अपना मुंह खोला और कहा-“यह सब हंगामा क्यों हो रहा है?”


ऐसा कहते ही कछुआ नीचे गिर गया और उसकी मौत ही गई।


शिक्षा:- जितना आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए। बेकार की बात ज्यादा करने से हानी स्वयं को ही होती है।



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